महात्मा शुकदेव जी, भागवत महापुराण की कथा सुनाते हुए राजा परीक्षित जी से कहते हैं कि, राजन जब किसी भी व्यक्ति का जब प्रारब्ध वश भाग्य बिगड़ जाता है तो उसकी बुद्धि विपरित हो जाती है, इसके उपरान्त उसका वाणी पर नियंत्रण समाप्त हो जाता है। फलतः स्वाभाविक तौर से अपने काल को जीवन लीला समाप्त करने के लिए आमंत्रित कर देता है।
गौरतलब है कि महाराज युधिष्ठिर जी अपने सभी आमंत्रित सगे संबंधियों के साथ राजसूय यज्ञ करने के निमित नदी में स्नान करने के उपरांत यज्ञ मंडप में बैठे हुए थे, वहां सभी श्रेष्ठ संत महात्माओं का आगमन धीरे धीरे हो रहा था, यहाँ तक कि भगवान शंकर, ब्रह्मा जी, इन्द्रदेव सहित सभी देवताओं का आगमन उस यज्ञ में हो चुका था। यही नहीं आस पास के पड़ोसी राजाओं का भी आगमन हो चुका था, जिसमे शिशुपाल भी सम्मिलित था।
उल्लेखनीय है कि राजसूय यज्ञ में सबसे पहले पूजा किसकी हो ? इस विषय में महाराज युधिष्ठिर जी अपने से सभी जानकार लोगों से इस विषय में विचार विमर्श कर रहे थे, तभी सहदेव जी ने अपनी बात रखते हुए कहा कि जड़ हो या चैतन्य सभी में हमारे भगवान श्री कृष्ण जी ही उसमें वास करते हैं, यहां तक कि कोई भी वस्तु उन्हीं से प्रारम्भ होती है और उन्हीं में समाहित हो जाती है, इसलिए सबसे पहले भगवान् श्री कृष्ण जी की ही पूजा होनी चाहिए। तत्पश्चात इस बात पर सभी संत महात्माओं ने एक स्वर से सहदेव जी के बातों का समर्थन किया, यहां तक कि सभी प्रमुख देवताओं द्वारा भी सहदेव जी के बातों का समर्थन किया।
गौरतलब है कि उपरोक्त सभी द्वारा समर्थन किए जाने पर वहां उपस्थित शिशुपाल को बहुत कष्ट हुआ तत्पश्चात उसने भगवान् श्री कृष्ण जी को उल्टा सीधा बोलना शुरू कर दिया। उसने यहां तक कहा कि कृष्ण कैसे अग्र पूजा का अधिकारी है ? इसने ना तो कोई उत्तम कुल में जन्म लिया है, और ना तो कोई यह राजकीय वंश से आता है। यही नहीं शिशुपाल ने यहाँ तक कहा कि इसका कार्य निहायत लम्पट वाला है, कहां तक इसके प्रतिकूल चरित्र के विषय में कहूँ ? इसने तो मेरी होने वाली पत्नी को भी अपहरण कर उसे भगा कर शादी कर लिया। यही नहीं अब तो लोग आम तौर पर यह भी कहने लगे हैं कि जहां भी कृष्ण रहता है, वहां की महिलाएं सुरक्षित नहीं होती हैं।
उल्लेखनीय है कि अब तो सभी के लिये शिशुपाल की बातों को बर्दाश्त करना मुश्किल हो रहा था, कुछ लोगों ने तो वहां से उठकर चल दिए तथा कुछ कृष्ण भक्त राजाओं द्वारा उसे मार डालने की चेष्टा करने लगे, परन्तु उसी समय भगवान श्री कृष्ण जी ने उनको रोक दिया।
अब तो स्वाभाविक तौर से भगवान् कृष्ण जी ने शिशुपाल को ललकारते हुए कहा कि अरे शठ अभी तक तूने जितने भी गलती किए थे, मैं अपने बच्चन से बंधे होने के कारण तुमको माफ किया था, परन्तु तुमने सीमा की रेखा को तोड़ कर अपने मौत को आमंत्रित किया है। तत्पश्चात भगवान श्री कृष्ण ने अपने चक्र सुदर्शन द्वारा शिशुपाल का सिर काट कर धड़ से अलग कर दिया। देखते देखते उसके शरीर से एक ज्योति निकलकर भगवान श्री कृष्ण जी में समाहित हो गई।
आप सबों का,
दिवाकर,