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General Knowledge 1 min read

।। महान संत श्री प्रेमानंद जी महाराज जी के शिष्य रसिक शरण दुलारी के निधन के पश्चात उनके आश्रम को शक भरी निगाहों से देखना, उनके अंदरुनी विरोधियों की एक सोची समझी साजिश, ।।

विगत दिनों पहले महान संत शिरोमणि श्री प्रेमानंद महाराज जी के एक शिष्य रसिक दुलारी जी के निधन का समाचार आम जनमानस के बीच जैसे ही आया, उसके उपरांत आम जनमानस के बीच उनके निधन का समाचार कौतूहल का विषय बन गया। गौरतलब है कि सीसीटीवी फुटेज में उनके निधन के स्थिति के सम्बन्ध में जो मुख्य कारण सामने आई है, उसके अनुसार संत रसिक दुलारी ने अपने मकान के चौथे तले से कूदकर आत्म हत्या की है, बाद में उनके पोस्टमार्टम के दौरान डॉक्टरों ने सूचित किया कि उनका प्राइवेट पार्ट कटा हुआ था। उसके पश्चात् रसिक दुलारी के परिजनों को सूचित किया गया तो उनके परिजनों ने आरोप लगाया कि उनका पुत्र लगभग दो साल पहले से प्रेमानंद महाराज जी से शिष्यता ग्रहण कर उनके सानिध्य में रह रहा था परन्तु ,जब भी वे लोग भेट करने आते थे, तो उनके पुत्र से मिलने नहीं दिया जाता था। अब यहाँ प्रश्न खड़ा होता है कि रसिक दुलारी जी आत्म हत्या क्यों किए या अपना प्राइवेट पार्ट काटकर आत्म हत्या क्यों किए ? यह जांच करने का विषय है, इस पर किसी प्रकार से किसी द्वारा कोई भी व्यक्तव्य देना अपने आप में मूर्खता को प्रदर्शित करना होगा।

उल्लेखनीय है कि विगत कुछ वर्षों से जिस प्रकार लाखों करोड़ों आम जनमानस को श्री राधा रानी जी के प्रति जोडक़र उनके जीवन को सवारने का कार्य किया है , वह किसी भी व्यक्ति से छिपी नहीं है। आज वृंदावन में जो आम नागरिकों द्वारा तीर्थ यात्रा का मुख्य उद्देश्य अधिकांश तौर पर दो ही होता है, एक श्री बाके विहारी जी का दर्शन करना। तत्पश्चात संत शिरोमणि श्री प्रेमानंद महाराज जी का किसी प्रकार दर्शन प्राप्त करना होता है। आज यह बताने की आवश्यकता नहीं है कि श्री प्रेमानंद महाराज जी युवाओं से लेकर वरिष्ठ व्यक्तियों के बीच भी काफी लोकप्रिय हैं।यही नहीं हिन्दू धर्म के अतिरिक्त अन्य धर्मों में भी उनकी लोकप्रियता किसी से छिपी नहीं है। आज लाखों नहीं करोड़ों भक्त उनके बताए हुए रास्ते से चलकर अपना जीवन सार्थक कर रहे हैं। जहां एक ओर कुछ सनातन धर्म के तथाकथित संतों द्वारा अपने सीमित स्वार्थों के चलते पूरे मानवता धर्म को सांप्रदायिक रंग रूप देने की कोशिश की जा रही है, वहीं दूसरी तरफ संत शिरोमणि श्री प्रेमानंद महाराज जी द्वारा अपने प्रवचन के माध्यम से पूरे मानवता में एक दूसरे के लिए प्रेम दर्शाने एवं समय आने पर एक दूसरे के लिए खड़ा होने के मार्ग पर चलने के लिए सिखाया जा रहा है।

उल्लेखनीय है कि बहुत ही कम बल्कि ना के बराबर सनातन धर्म के संतों के यहां दूसरे धर्म के मानने वाले व्यक्तियों का आवागमन होता है, परंतु अधिकांशतः देखा गया है कि संत शिरोमणि श्री प्रेमानंद महाराज को के दरबार में दूसरे धर्म के व्यक्तियों द्वारा आकर उनके प्रति श्रद्धा भाव अर्पित किया जाता है। यही नहीं अगर हमलोग यह कहे कि संत शिरोमणि श्री प्रेमानंद महाराज जी संतों के संत हैं तो इसमें कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी।

जिस तरह महत्वपूर्ण सेलिब्रेटी से लेकर वरिष्ठ राजनेताओं द्वारा संत शिरोमणि श्री प्रेमानंद महाराज जी के चरणों में शीश नवाकर अपना श्रद्धा भाव अर्पित किए, उससे वहां के तथाकथित अपने आप को संत शिरोमणि श्री प्रेमानंद महाराज जी से भी ऊपर मानने वाले महात्माओं को बर्दाश्त करना मुश्किल हो गया। इधर हाल फिलहाल के दशकों में प्रायः कम ही अवसर आम नागरिकों को देखने को मिला है जहां किसी राष्ट्रपति जी द्वारा कोई संत महात्माओं के पास जाकर अपना श्रद्धा भाव अर्पित किए हों।

उल्लेखनीय है कि आम तौर से हाल फिलहाल के वर्षों में जब से संत शिरोमणि श्री प्रेमानंद महाराज जी का ब्रज की भूमि में आम व्यक्तियों के बीच जाने पहचाने जाने लगे हैं, तब से अपने आप को तथाकथित महान संत मानने वालों की दुकानदारी थोड़ी धीमी पड़ गई है। वे बराबर इसी प्रयास में रहते थे कि कैसे संत शिरोमणि श्री प्रेमानंद महाराज जी की छवि को आम जनमानस के बीच किसी भी प्रकार शक के दायरे में लाया जाय ?

अतः मुझे यह बात कहने में कोई गुरेज नहीं है कि रसिक दुलारी जी की आत्म हत्या इन तथाकथित संतों के ईर्षा द्वेष का परिणाम है।

आप सबों। का,

दिवाकर ,

ND

Nandkumar Diwakar

Author & Founder, Radha Krishan Global Knowledge

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Nandkumar Diwakar is an avid researcher and writer dedicated to sharing authentic knowledge, insights, and perspectives through this blog platform.

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