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General Knowledge 1 min read

।। वृत्तासुर द्वारा महादेव शंकर जी से किसी को भी भस्म करने का वरदान प्राप्त कर, उस प्राप्त वरदान का प्रथम प्रयोग महादेव शंकर जी पर ही करने का प्रयास करना, ।।

महात्मा श्री शुकदेव जी, श्री भागवत महापुराण की कथा को सुनाते हुए राजा परीक्षित जी से कहते हैं कि, राजन एक बार की बात है कि शकुनि के पुत्र वृत्तासुर की हमेशा यह मन में मंशा रहती थी कि किसी ऐसे देवता की भक्ति की जाय जिससे कि मुझे असीमित शक्ति शीघ्र प्राप्त हो जाय। परन्तु उसे सही मार्ग को बताने वाला कोई गुरु नहीं मिल रहा था। वह अनायास ही राह में भटक रहा था कि सामने से आते हुए देवर्षि नारद जी से वृत्तासुर की मुलाकात हो गई। अब वृत्तासुर के लिए यह स्वाभाविक ही था कि वह देवर्षि नारद जी ने देखकर दंडवत प्रणाम किया। तत्पश्चात देवर्षि नारद जी ने वृत्तासुर से पूछा कि क्या बात है, तुम बहुत ही चिंतित दिखाई दे रहे हो ? उल्लेखनीय है कि अब तो वृत्तासुर अपने मन की बातों को बताते हुए कहा कि देवर्षि जी, मुझे आप यह बताए कि कौन से देवता भक्ति भाव करने से शीघ्र प्रसन्न हो जाते हैं।

गौरतलब है कि वृत्तासुर के प्रतिउत्तर देते हुए देवर्षि नारद जी ने कहा कि ऐसे तो भक्ति द्वारा सभी देवता प्रसन्न होते हैं, परन्तु यदि कोई महादेव शंकर जी की भक्ति करे तो वे शीघ्र ही प्रसन्न हो जाते हैं। उल्लेखनीय है कि देवर्षि नारद जी के द्वारा कही गई बातों को ध्यान में रखकर वृत्तासुर एकान्त वन में जाकर महादेव शंकर जी की भक्ति करने लगा। पहले तो वह एक अग्नि कुंड का निर्माण कर उसमें नवेध, फलों,पुष्पों द्वारा अग्नि को ही महादेव शंकर जी का स्वरूप मानकर उसमें आहूति देने लगा। कुछ दिनों तक फलों,पुष्पों द्वारा जब अग्नि में आहुति देने से महादेव शंकर जी को प्रसन्न ना कर सका तो उसने अपने शरीर के मांस को काटकर अग्नि में आहुति देना शुरू किया, परन्तु इतने में भी बात नहीं बनी तो उसने अपने गरदन को काटने का प्रयास ज्योही किया कि, तुरन्त अग्नि कुंड से भगवान भोले शंकर जी प्रकट होकर उसका हाथ पकड़कर कहा कि वृत्तासुर तुम्हारी भक्ति से मैं बहुत प्रसन्न हूं,बोलो तुम क्या चाहते हो ? अब तो वृत्तासुर के खुशी की कोई सीमा नहीं थी, उसने बड़े ही सोच समझकर महादेव शंकर जी से कहा कि प्रभु, यदि आप कोई वरदान मुझे देना ही चाहते हैं तो मुझे ऐसा वरदान दीजिए कि जिस पर मैं अपने हाथ को रख दूं, वह भस्म हो जाए। महादेव शंकर जी ने वृत्तासुर के माँग को स्वीकार कर दिया।

उल्लेखनीय है कि वृत्तासुर। की आयु भी अब पूर्ण होने लगी थी, देव वश वह सोचने लगा कि सत्य में मुझे किसी को भस्म करने की शक्ति प्राप्त हुई है कि नहीं, इसका प्रयोग क्यों ना कर लिया जाए। उसने उस शक्ति का प्रयोग महादेव शंकर जी पर ही करने को सोचने लगा। गौरतलब है कि महादेव शंकर जी ने उसकी मन की स्थिति को भापकर वृत्तासुर से दूर भागना शुरू कर दिया।अब वृत्तासुर भी महादेव को पीछा करने लगा।

उल्लेखनीय है कि इसी के बीच में भगवान् श्री विष्णु जी को किसी प्रकार जानकारी प्राप्त हुई कि महादेव शंकर जी वृत्तासुर के द्वारा काफी परेशान हैं, तब उन्होंने एक ब्रह्मचारी का भेष बनाकर वृत्तासुर के पास पहुंचकर बोले कि मान्यवर वीर आपके रूप सौंदर्य को देखकर लगता है कि आप काफी वीर योद्धा हैं, तथा आप थके हुए भी मालूम हो रहे हैं। फिर भगवान् श्री विष्णु जी ने वृत्तासुर से कहा कि देखिए जीवन का असली सुख तो शारिरिक सुख ही है। आप थोड़ा बैठ जाइए, और अपनी समस्याओं को हमसे कहिए, शायद हम आपको समाधान करने का कुछ उपाय बता दे।

उल्लेखनीय है कि वृत्तासुर की बुद्धि विपरित हो गई थी, उसे सही और गलत का पहचान नहीं हो रहा था। उसने महादेव शंकर जी के साथ हुई घटनाओं के सम्बन्ध में ब्रम्हचारी वेशधारी भगवान् श्री विष्णु जी से कह दिया। तत्पश्चात भगवान श्री विष्णु जी ने कहा कि क्या तुम भी बात करते हो उनको तो अपने ससुर प्रजापति दक्ष के यज्ञ में महादेव शंकर जी की सभी प्रकार की शक्तियों को समाप्त कर दिया गया है। उल्लेखनीय है कि भगवान श्री विष्णु जी यह जानते थे कि वृत्तासुर की बुद्धि भ्रष्ट हो गई है कि इसे वास्तविकता का कुछ भी ज्ञान नहीं है।अब सही स्थिति को भापकर विष्णु जी ने कहा कि महादेव शंकर जी की शक्ति है कि नहीं, इसको अपने ही सिर पर हाथ रख कर देख लो। गौरतलब है कि वृत्तासुर ने जैसे ही अपना हाथ अपने ऊपर रखा, वैसे ही वह भस्म हो गया।अब महादेव शंकर जी की जान में जान बची।

आप सबों का,

दिवाकर ,

ND

Nandkumar Diwakar

Author & Founder, Radha Krishan Global Knowledge

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Nandkumar Diwakar is an avid researcher and writer dedicated to sharing authentic knowledge, insights, and perspectives through this blog platform.

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