महात्मा श्री शुकदेव जी से भागवत महापुराण की कथा सुनते हुए राजा परीक्षित जी ने महात्मा श्री शुकदेव जी से प्रश्न करते हैं कि, महात्मा जी हमें यह बात बताए कि माता देवकी जी क्यों एकाएक भगवान् श्री कृष्ण जी से अपने मरे हुए छह पुत्रों को वापस लाने हेतु आग्रह करती हैं ?
उल्लेखनीय है कि राजा परीक्षित को के प्रश्नों को सुनकर महात्मा श्री शुकदेव जी ने बहुत ही गंभीरता पूर्वक उतर देते हुए कहा कि राजन, माता श्री देवकी जब यह बात जान गई कि मेरा कान्हा अपने गुरु सांदीपनि जी को अपने मरे हुए पुत्र को वापस जमलोक से लाकर गुरु दक्षिणा के रूप में दिया है, तब से माता देवकी जी मन में हमेशा विचार करती थी कि मैं भी अपने कान्हा से अपने कंस द्वारा मारे गए सभी छह पुत्रों में वापस लाने हेतु आग्रह करूंगी।
गौरतलब है कि एक दिन भगवान् श्री कृष्ण जी एवं भगवान बलराम जी दोनों भाई अपने माता पिता के साथ बैठे हुए थे, उसी समय माता देवकी जी ने भगवान् श्री कृष्ण जी से कहा कि कान्हा तुमसे कुछ माँगना चाहती हूं, क्या तुम मेरी मांग को पूरा करोगे ? उल्लेखनीय है कि भगवान श्री कृष्ण जी ने अपनी माता देवकी जी की बातों को सुनकर कहा कि मां तुम केवाल निःसंकोच होकर मुझे आदेश दो ! तुम्हारे हर आदेश का अनुपालन किया जायेगा। भगवान् श्री कृष्ण जी की बातों को सुनकर भगवान बलराम जी ने भी अपनी सहमति में अपना सिर को हिलाकर सकारात्मक रूप से प्रस्तुत किया। तत्पश्चात माता देवकी जी ने कहा कि कान्हा तुम्हारे बड़े भाईयों को कंस द्वारा जो मार दिए गए थे, मुझे उन सभी पुत्रों को वापस देखने की अभिलाषा है, क्या तुम मेरा यह कार्य नहीं करोगे ?
गौरतलब है कि भगवान श्री कृष्ण जी एवं भगवान बलराम जी माता देवकी जी की अभिलाषा को जानकर तुरन्त अपने योग माया शक्तियों के बल पर यथाशीघ्र सुतल लोक को गए, जहाँ दैत्य राज बलि जी का शासन था। उल्लेखनीय है कि भगवान श्री कृष्ण जी एवं भगवान बलराम जी को देखते ही राजा बलि जी अपने आसन्न से उठकर खड़ा होकर भगवान् श्री कृष्ण जी एवं भगवान बलराम को को अपना मुकुट युक्त सिर उनलोगों के पैरों में रखकर प्रणाम किया तथा अपने सेवकों से पूजा अर्चना की सामग्री मंगाकर उन दोनो भाइयों को वैदिक रिति से पूजा अर्चना की। तत्पश्चात राजा बलि जी ने भगवान् श्री कृष्ण जी एवं भगवान बलराम जी को स्वादिष्ट व्यंजन खिलाकर, यहाँ आने का प्रयोजन जानना चाहा।
गौरतलब है कि भगवान श्री कृष्ण जी एवं भगवान बलराम जी राजा बलि जी के निश्छल मन को जानते हुए कहा कि बलि, भगवान श्री ब्रह्मा जी के चौथे मन्वंतर में ब्रह्मा जी के मन मलिन होने के कारण अपनी पुत्री से सम्बन्ध बनाना चाहा था, उसी समय वहां खड़ा उनके सेवकों ने ब्रह्मा जी के इस भाव को भापकर ब्रह्मा जी को उपहास किया था, तत्पश्चात ब्रह्मा जी ने उन सभी को दैत्य योनि में जन्म लेने का श्राप दिया था, उसके बाद उनलोगों ने हिरण्यकश्यप के यहाँ जन्म लिया। उल्लेखनीय है कि वहां से उनलोगों ने अपनी आयु पूरी करके मेरी माता देवकी जी के गर्भ में प्रवेश किया, परन्तु देव प्रेरणा से उनको एक एक करके जन्म लेने के पाश्चात्य ही भोजराज कंस द्वारा मार दिया गया। अब मेरी माता देवकी जी की अभिलाषा है कि उन सभी पुत्रों को शीघ्र देखने के लिए, अतः तुम उन सभी को वापस लाकर मुझे सौंप दो, ताकि मैं अपनी माता देवकी जी को उन्हें समर्पित कर दूं।
गौरतलब है कि दैत्य राज बलि ने भगवान् श्री कृष्ण जी के दिए हुए आदेश को पालन करना अपने लिए सौभाग्य मानने लगा तथा उन सभी भगवान् श्री कृष्ण जी के भाईयों को लाकर उन्हें सौंप दिया। तत्पश्चात भगवान श्री कृष्ण जी एवं भगवान बलराम जी ने उनको लेकर अपने माता देवकी जी को जाकर उन सभी छह पुत्रों को दे दिया।
उल्लेखनीय है कि जब माता देवकी को ने उन ब्राह्मणों पुत्रों से देखा तो उन्हें वात्सल्य भाव के कारण अपने आप ही अपने स्तनो से दूध गिरने लगा। जब उन पुत्रों द्वारा माता देवकी को के दूध पान करने के पश्चात देखते देखते वे सभी लोग देवलोक में चले गए तथा माता देवकी जी को शांति प्राप्त हो गई।
आप सबों का,
दिवाकर,