महात्मा श्री शुकदेव जी, भागवत महापुराण की कथा सुनाते हुए राजा परीक्षित जी से कहते हैं कि, राजन भगवान् श्री कृष्ण जी जब मथुरा छोड़कर द्वारिका पूरी की स्थापना जब से किए थे, उसके बाद ऐसा कोई अवसर नहीं आया कि ब्रजवासियों और यदुवंशियों का मिलन हो सके। दैवसंजोग से उस समय एक दुर्लभ सूर्यग्रहण लगने वाला था तो, यदुवंशियों ने विचार विमर्श आपस में किया कि क्यों न प्रभास क्षेत्र में चलकर स्नान ध्यान किया जाय। उल्लेखनीय है कि इसी तरह की सोच समस्त ब्रजवासियों ने भी किया। अतः दोनों पक्षों द्वारा सूर्य ग्रहण के अवसर पर स्नान करने के लिए निकल दिए। यहां बताना जरूरी होगा कि प्रभास क्षेत्र हस्तिनापुर के इलाका के आस पास क्षेत्र को कहा जाता है, जो भगवान् परशुराम जी से संबंध होने के कारण काफी पवित्र माना जाता है।
गौरतलब है कि जब ब्रजवासियों और यदुवंशियों का आपस में मिलन हुआ तो वे लोग काफी खुश होकर एक दूसरे पक्ष से अपने अपने तरफ से शिकायत करने के साथ एक दूसरे का हाल चाल जानकर आनंदित हुए। इसी क्रम में पाण्डव की पत्नी महारानी द्रौपदी जी भगवान् श्री कृष्ण जी की पटरानियों एवं रानियों से मुलाकात करने पहुंच गई। उल्लेखनीय है कि बात चित के क्रम में द्रौपदी जी ने भगवान् श्री कृष्ण जी की प्रथम पत्नी रुक्मिणी जी से पूछा कि देवी जी हमे ये बताए कि आपने भगवान् को कैसे मोहित कर लिया था ?
। द्रौपदी जी के प्रतिउत्तर में रुक्मिणी जी कहती हैं कि जानती हो द्रौपदी जी, जब से भगवान् कृष्ण जी के लीला के विषयों में अपने दरबारियों से सुना था, तभी से मन में यह संकल्प कर लिया था कि जब भी मैं शादी करूंगी तो भगवान् श्री कृष्ण जी से ही करूंगी। मेरा इसी संकल्प को भगवान् श्री कृष्ण जी ने देखते देखते सभी वीर राजाओं के बीच से मुझे हर कर ले गए और उन्होंने मुझे पाणिग्रहण कर लिया। इसी तरह का जवाब एक एक करके सभी पटरानियों ने अपने स्तर से दिया।
गौरतलब है कि लगभग सोलह हजार से अधिक रानियों की प्रतिनिधि के तौर पर रोहिणी जी ने द्रौपदी जी से कहा कि जानती है देवी जी, जब हमलोगों को भौमासुर द्वारा हरण कर बन्दी बना लिया गया था तो, उस संकट की स्थिति में हमलोगों को उसके कैद से भगवान् कृष्ण जी ने ही आजाद किया था। उसी समय से भगवान् कृष्ण जी का दर्शन प्राप्त करने के पश्चात ही हमलोगों ने संकल्प किया कि अब तो हमलोग भगवान् श्री कृष्ण जी को ही अपना पति के रूप में वरन करेंगे। भगवान श्री कृष्ण जी ने हमलोगों के संकल्प को जानकर, हमलोगों को अपने साथ पाणिग्रहण कर लिया। देवी जी हमलोग तो यही चाहते हैं कि जन्म जन्म तक भगवान् श्री कृष्ण जी के दासी बनने का सौभाग्य हमलोगों को प्राप्त होता रहे।
आप सबों का,
दिवाकर,