यहां यह उल्लेख करना जरूरी है कि पश्चिमी देशों के एक देश से संबंध रखने वाले लोक प्रशासन के एक प्रसिद्ध विद्वान मैक्स बेबर ने अपने एक व्याख्यान में कहा था कि किसी भी देश की अगर सफल नीति को आंकना हो या उस देश के विकास के पैमाना को जांचना हो तो उपरोक शीर्षक के अन्तर्गत वर्णित व्यक्तियों के पुनर्वास का स्तर सरकार के तरफ से कितना हो रहा है और उपरोक्त शीर्षक के अंतर्गत वर्णित व्यक्तियों की संख्या कितनी है, उस देश के सुस्पष्ट नीति और उस देश के विकाश का पैमाना आसानी से पता चल सकता है।
गौरतलब है कि संविधान सभा में चर्चा के दौरान संविधान सभा के एक महत्वपूर्ण सदस्य बी आयंगकर के विरोध के बावजूद डॉक्टर भीमराव अंबेडकर ने उपरोक्त शीर्षक के अन्तर्गत वर्णित व्यक्तियों के कल्याण हेतू एक अलग से केंद्र सरकार के साथ साथ प्रत्येक राज्यों की सरकारों द्वारा एक अलग मंत्रालय का गठन होगा जिसका नाम कल्याण मंत्रालय होगा।इस मंत्रालय के अंतर्गत आम नागरिकों के साथ विशेष रूप से उपरोक्त शीर्षक के अन्तर्गत वर्णित व्यक्तियों के कल्याण के लिए विशेष प्रावधान होगा। हालांकि वर्तमान समय में इसका नाम केन्द्र सरकार में बदलकर सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय रखा गया है।
गौरतलब है कि आजादी के लगभग 80 साल बीतने के बाद भी हमारे देश में जगह जगह पर कोई ना कोई कूड़ा बीनने वाला व्यक्ति मिल जायेगा। उल्लेखनीय है कि इसमें अधिकांश की आयु 14 वर्ष या उससे कम होती है। यही नहीं किसी मंदिर के गेट पर हम सब जाते हैं तो उनमें सबसे प्रथम दर्शन वहां गेट पर बैठे इन भिक्षुको की हो जाती है। यहां यह भी उल्लेखनीय है कि हमारे देश में ऐसे असहाय विधवा महिलाएं हैं, जिनका देख रेख करने वाला कोई नहीं है। उसका दुष्परिणाम यह होता है कि जवान असहाय विधवा महिलाएं या तो किसी मनचलों की यॉन उत्पीड़न की शिकार हो जाती है या अपनी जिंदगी जीने के लिए दूसरों के सामने भिक्षुक के रूप में मांगने पर मजबूर हो जाती है। हालांकि मेरा यह कहने का मतलब नहीं है कि सभी असहाय विधवा महिलाएं इस तरह की कृत्यों को करती हैं। हाँ इसमें कुछ पढ़ी लिखी असहाय विधवा महिलाएं आप अपने आप को कोई निजी नौकरी या व्यवसाय कर अपना जीविकोपार्जन करती है। सबसे बुरा हाल तो वे वृद्ध माता पिता की हो गई है जो कि अपनी सभी दौलत लगाकर अपने बाल बच्चों को एक इजत की जिंदगी दिए,और वही बच्चे जब एक अपना एक सुस्थापित स्थान प्राप्त कर लेते हैं तो वे अपने माता पिता को वृद्धाश्रम में या असहाय छोड़कर अपने बाल बच्चों के साथ रहते हुए अपने पारिवारिक स्तर पर या सार्वजनिक मंचों पर निर्लज्जता के साथ शेखी बघारने में उन्हें कोई संकोच नहीं होता है।
उससे भी बढ़कर उल्लेखनीय बात यह है कि आज भारत के किसी भी नगर या महानगर में यात्रा करने पर एक बात आम तौर पर किसी भी चौक चौराहे पर मैले कुचैले किसी भी कोने बैठे हुए मानसिक रूप से विक्षुब्ध व्यक्ति मिल ही जाता है। हैरानी की बात तो तब होती है, जब निश्चित तौर पर उस रास्ते से किसी भी समय समाज कल्याण या उस व्यक्ति के कल्याण से संबंधित विषय के अधिकारी अवश्य उस रास्ते से गुजरते होंगे ,परन्तु उस विशुद्ध व्यक्ति पर वे किसी भी प्रकार अपना घ्यान देना उचित नहीं समझते हैं।
उल्लेखनीय है कि ऊपरोक शीर्षक के अन्तर्गत वर्णित व्यक्तियों के कल्याण करने हेतु आजादी के समय से ही एक अलग से गठन कर मंत्रालय बनाया गया, जिसका नाम कल्याण मंत्रालय रखा गया। हालांकि वर्तमान समय में इसका नाम अभी सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय रखा गया है। गौरतलब है कि प्रति वर्ष इस मंत्रालय में करोड़ो नहीं अरबों रुपए प्रत्येक वित्तीय वर्ष में केन्द्र सरकार के वित्त मंत्रालय द्वारा आवंटन किया जाता है, परंतु दुर्भाग्य है कि हमारे देश की अधिकांश आम जनमानस यह नहीं जानती है कि आखिर सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय का मुख्य कार्य एवं अधिकार क्या है ? अब तो स्वाभाविक तौर पर हमे यह समझने में देर नहीं लगती है कि जब किसी विभाग के संगठन या उसके संबंधित अधिकारियों द्वारा जनता के हित से संबंधित जब समय समय पर कार्य किया जाता है तो आम लोगों के दिमाग में भी जानकारी प्राप्त हो जाती है कि संबंधित मंत्रालय या विभाग का क्या कार्य है ?
गौरतलब है कि इस मंत्रालय की कड़ी में सांगठनिक रूप से भी प्रखंड स्तर से लेकर राज्य या केंद्र स्तर पर भी पदाधिकारी से लेकर मंत्री तक सुसंगठित रूप से अधिकार युक्त संगठन, जो प्रशासनिक एवं वैधानिक रूप से सक्षम है। परन्तु अफसोस तो तब होता है, उपरोक्त शीर्षक के अन्तर्गत वर्णित व्यक्तियों को कोई विशेष ध्यान उनके जीवन स्तर सुधारने या पुनर्स्थापित करने हेतु अभी तक नहीं दिया गया है।
आप सबों का ,
दिवाकर,