महात्मा श्री शुकदेव जी, भागवत महापुराण की कथा सुनाते हुए राजा परीक्षित जी से कहते हैं कि, राजन किसी भी व्यक्ति या समाज को एक दूसरे से मिलना या बिछड़ना सब कुछ पहले से ही। निर्धारित की गई एक तय नियम के अनुसार ईश्वर की मर्जी पर निर्भर करता है। भगवान् श्री कृष्ण जी एवं उनके प्रिय ब्रजवासी काफ़ी दिनों से एक दूसरे से बिछड़ गए थे। गौरतलब है कि दोनों पक्ष एक दूसरे से मिलना चाहते थे, परन्तु अभी तक ऐसा कोई देववश कोई संजोग नहीं बना था, जिससे कि वे लोग एक दूसरे से मिल सके।
ईश्वरीय संजोग से एक समय ऐसा आया जो दोनों पक्षों के मिलने में एक महत्वपूर्ण कड़ी साबित हुआ। बताया जाता है कि बहुत वर्षों के बाद एक दुर्लभ सूर्य ग्रहण लगने जा रहा था। द्वारिका के यदुवंशियों ने भगवान् श्री कृष्ण जी से विचार विमर्श कर यह निर्धारित किया कि इस बार स्नान प्रभास क्षेत्र में किया जायेगा, जो हस्तिनापुर के नजदीक पड़ता है। यहां यह उल्लेखनीय होगा कि प्रभास क्षेत्र भगवान श्री परशुराम जी द्वारा क्षत्रियों के इक्कीस बार समस्त पृथ्वी से संहार करने के कारण उनके खून से प्रभास क्षेत्र में कई कुण्डों का निर्माण हो गया था, मान्यता के अनुसार इसलिए यह क्षेत्र पवित्र क्षेत्र के रूप में माना जाता है।
गौरतलब है कि जैसा द्वारिका के यदुवंशियों द्वारा सोचकर प्रभास क्षेत्र में चलने की तैयारी करने लगे, वैसे ही सोच नन्द बाबा एवं गोपियों समेत समस्त ब्रजवासियों द्वारा सोचकर प्रभास क्षेत्र में यात्रा करने की तैयारी करने लगे। उल्लेखनीय है कि ईश्वरीय संजोग वश वह दिन भी आ गया जब दोनों पक्षों द्वारा प्रभास क्षेत्र में पहुंचकर एक दूसरे से बारी बारी से मिलने की कोशिश करने लगे।सभी संबंधियों ने एक दूसरे से मिलकर प्रेमपूर्वक अपना भावनात्मक पक्ष रखा। जिसका कुछ वर्णन निम्नलिखित रूप में कर रहा हूं।
उल्लेखनीय है कि पाण्डव की माता कुन्ती जी अपने भाई श्री वसुदेव जी से मिली तो बहुत ही स्नेहपूर्वक शिकायत करते हुए कही कि भैया आपति के समय सभी कोई अपनो से पीछा छुड़ा ही लेता है, भैया इतनी विपति में आपकी राह देखती रही परन्तु एक बार भी आपका दर्शन नहीं कर पाया। माता कुन्ती जी के प्रत्युत्तर में वसुदेव जी कहते हैं कि बहन शायद तुम जानती ही हो, कि जब कोई व्यक्ति खुद जब गहरे संकट में पड़ता है तो कैसे कोई किसी भी संबंधी से कैसे मिल सकता है या अपने से मदत कर सकता है ? बड़ी मुश्किल से हमलोगों को ईश्वर की कृपा भोज राज कंस से छुटकारा प्राप्त हुआ है, अब जाकर चैन की साँस ले रहा हूं।
दूसरी तरफ भगवान् श्री कृष्ण जी एवं भगवान श्री बलराम जी नन्द बाबा एवं माता यशोदा जी से मिले। उन दोनो भाइयों को जब नन्द बाबा एवं माता यशोदा जी ने देखा तो ऐसा महसूस हुआ कि मानो मृत शरीर में प्राण का संचार हो गया है। माता यशोदा जी ने भगवान् श्री कृष्ण जी एवं भगवान बलराम जी को अपनी गोद में बैठाकर आलिंगन करते हुए चूमने लगी, माता यशोदा जी को बहुत दिनों के बाद मिलने की खुशी में प्रेमाश्रुओं का बहाव होने लगा।
उल्लेखनीय है कि भगवान श्री कृष्ण जी अपनी माता यशोदा जी से अनुमति प्राप्त कर ब्रज की गोपियों से मिलने के लिए उनके पास गए। जब गोपियों की नजर भगवान् श्री कृष्ण जी पर पड़ी तो उनको यह सहसा विश्वाश ही नहीं हो रहा था कि सामने खड़ा उनका अपना श्याम सुंदर है। उन गोपियों द्वारा एक टक भगवान श्री कृष्ण जी के मुख मंडल को अपने आँखो से निहारते हुए वे गोपियां भगवान् श्री कृष्ण जी को अपने हृदय में धारण कर अपने आप को एकत्व भाव से श्री कृष्ण जी को समाहित कर लिया । अब वे गोपियां कृष्णत्व हो गई। गौरतलब है कि भगवान श्री कृष्ण जी तो अंतर्यामी हैं, उन्होंने गोपियों का यह भाव देखकर गोपियों से कहा कि हे सखी, तुमलोग पूर्व जन्म में जरूर कोई ऊंचे स्तर के संत महात्मा रही होगी, तभी तो तुम्हारे हृदय में इस तरह के भाव प्रकट हुए हैं। क्योंकि वर्षों वर्ष सिद्ध संतों एवं महात्माओं या योगियों द्वारा अपने साधना में व्यतीत कर दिया जाता है, फिर भी इस तरह के तारतम्य मेरे साथ स्थापित नहीं कर पाते हैं, और तुम लोग मात्र मेरा दर्शन प्राप्त कर इस तरह मुझे अपने हृदय में समाहित कर लिया। भगवान् श्री कृष्ण जी ने गोपियों से यह भी कहा कि हे सखी, मैं हमेशा तुमलोगों के हृदय में समाहित हो कर रहूंगा।
आप सबों का,
। दिवाकर,