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।। भारत के अधिकांश जेलों में बंद कैदियों के साथ भेदभाव, तथा जेलों में रहन सहन की सबसे बदहाल स्थिति, ।।

गौरतलब है कि भारतीय आजादी आंदोलन के दौरान महात्मा गांधी जब भारतीय जेलों में समय समय पर बंद अंग्रेज सरकार द्वारा किए गए थे उस दौरान अंग्रेजी जेल प्रशासन द्वारा गांधी जी को भी सामान्य तौर पर यातना अन्य कैदियों के मुकाबले में कम दिया जाता था, फिर भी अन्य कैदियों को जो जेल प्रशासन द्वारा यातना दिया जाता था, उसको देखकर महात्मा गांधी ने अपने जेल डायरी में लिखा है कि जेल में बंद कैदी भी समाज के एक महत्वपूर्ण अंग है,इन कैदियों के साथ भी मानवीय व्यवहार होनी चाहिए। उस डायरी में खास कर के यह भी जिक्र किया है कि अगर हमारा देश आजाद हो जाता है तो आने वाले निकट भविष्य में जितने भी कैदी जेलों में बंद होंगे उनके साथ मानवीय स्तर के व्यवहार के साथ उनके रहन सहन के साथ खान पान का भी खास ध्यान दिया जाएगा।

गौरतलब है कि आजादी के लगभग 80 साल हो गए हैं,परन्तु भारतीय जेलों की स्थिति में कोई खास परिवर्तन देखने को नहीं मिलता है। हाँ थोड़ा बहुत बदलाव अंग्रेजी शासन व्यवस्था से इस समय देखा जा सकता है, जैसे अंग्रेजी शासन व्यवस्था में कैदियों के साथ घोर अमानवीय कृत्य किया जाता था ,जो वर्त्तमान शासन व्यवस्था में कुछ सुधार देखने को मिलता है।अगर सफाई खान पान के दृष्टिकोण से देखने पर पता चलता है कि अधिकांश जेलों में बंद कैदी नारकीय जीवन जीने को विवश हैं।

उल्लेखनीय है कि जेलों में बंद कैदियों के साथ घोर भेदभाव किया जाता है, जो कैदी कोई राजनीतिक दल का प्रमुख पदाधिकारी या जन प्रतिनिधि रह चुका है या कोई बड़े राजनीतिक पद या प्रशासनिक पदों पर बैठे हुए रिश्तेदारों के परिवार के लोग अगर किसी भी जेल में कैदी के रूप में बंद हैं तो उनके साथ जेल प्रशासन अपने दामाद की तरह खातिर दारी करता है।यही नहीं उन V I P कैदियों को विशेष सेल की व्यवस्था कर उसमें टीवी कूलर से लेकर अत्याधुनिक सुविधाओं से परिपूर्ण कर देता है।

वहीं दूसरी तरफ आम कैदियों के लिए ना तो ठीक से सोने, खाने या साफ सफाई की भी व्यवस्था नहीं रहती है। यही नहीं एक एक सेल में 20 कैदी की जगह 40 या 50 कैदियों को भेड़ बकरियो की तरह ठूस दिया जाता है।

हालांकि सरकार के तरफ से खाने पीने की मेनू बहुत ही स्वास्थवर्धक दृष्टि से बनाया जाता है, परन्तु जेल प्रशासन के प्रमुख प्रशासनिक अधिकारी द्वारा अपने सीमित स्वार्थों के चलते उन कैदियों को जानवर के समान भोजन करने को मजबूर कर देते हैं। वहीं इसमें जिला प्रशासन या जेल के संबंधित उच्च स्तरीय पदाधिकारियों की भी गलती है जो सरकार द्वारा कैदियों से संबंधित उपलब्ध कराई गई सुविधा की जांच के लिए वे समय समय पर औचक निरीक्षण नहीं करते हैं।

दूसरी ओर न्यायालय में नित्य प्रति बढ़ते हुए केसों के कारण जेलों में कैदियों का अनावश्यक बोझ बढ़ रहा है। इसमें सरकार को अस्थाई रूप से न्यायाधीशों की नियुक्ति कर अधिक से अधिक अपराध संबंधी दर्ज मुकदमों को निपटारा कर कम किया जा सकता है या प्रत्येक जिलों में जनसंख्या के अनुसार एक या दो तीन अतिरिक्त जिलों का निर्माण कर कैदियों के रहन सहन के स्तर को सुधारा जा सकता है।

जहां तक राजनीतिक दलों के प्रमुख पदाधिकारियों एवं उच्च पदस्त पदाधिकारी के रिश्तेदारों को भारतीय जेलों में बंद कैदियों को किसी भी प्रकार से विशेष सुविधा जेल प्रशासन द्वारा नहीं दिया जाना चाहिए। सरकार को एक विशेष क़ानून बनाकर इस भेदभाव युक्त व्यवस्था पर रोक लगानी चाहिए। यही नहीं सरकार द्वारा एक प्राथमिकता तय कर जेल से संबंधित उच्च अधिकारियों द्वारा एक तय निर्धारित प्रक्रिया द्वारा कम से कम सप्ताह में एक बार जेल के सुदृढ़ व्यवस्था बनाने हेतु जांच अवश्य करानी चाहिए। हाँ इतना जरूर संबंधित पदाधिकारी को ध्यान रखना चाहिए कि कि भारतीय जेलों में बंद कैदी भी समाज का एक अभिन्न अंग है।

आप सबों का,

दिवाकर,

ND

Nandkumar Diwakar

Author & Founder, Radha Krishan Global Knowledge

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Nandkumar Diwakar is an avid researcher and writer dedicated to sharing authentic knowledge, insights, and perspectives through this blog platform.

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