महात्मा शुकदेव जी, श्री भागवत महापुराण की कथा राजा परीक्षित जी को सुनाते हुए कहते हैं कि राजन,जब भगवान् श्री कृष्ण जी भौमासुर के कैद से सोलह हजार से अधिक कन्याओं को छुड़ाने के उपरांत,उन कैद से आजाद हुई कन्याओं के विशेष अनुनय विनय करने पर भगवान कृष्ण जी ने उनसे वैदिक रिति से पाणिग्रहण किया तथा वे अपने साथ सभी कन्याओं को द्वारिका पूरी में ले जाकर प्रत्येक पत्नी के लिय रहने योग्य सुसज्जित महल की व्यवस्था करवाई। यही नहीं उन सभी पत्नियों के लिए यथोचित समय पर उचित प्यार भी लुटाते रहे, इस बात की चर्च पूरे ब्रह्मांड में फैल गई जिसमे देवलोक भी सम्मिलित था।
उल्लेखनीय है कि जब इस बात की जानकारी देवर्षि नारद जी को प्राप्त हुई तो स्वाभाविक तौर से भगवान् कृष्ण जी के दिनचर्या देखने की उत्सुकता हुई। अचानक एक दिन देवर्षि नारद जी घूमते हुए द्वारिका नगरी पहुंचकर, सबसे पहले उन्होंने माता रूक्मिणी जी के महल में जाने के उपरांत उनके शयन कक्ष में प्रवेश किया, रुक्मिणी जी के कक्ष में प्रवेश के उपरांत देवर्षि नारद जी देखते हैं कि भगवान् श्री कृष्ण जी अपनी पत्नी माता रुक्मिणी जी के साथ हास परिहास कर रहें हैं। उल्लेखनीय है कि जैसे ही भगवान कृष्ण जी की नजर देवर्षि नारद जी पर पड़ी, तत्पश्चात भगवान अपने शयन सेज से तुरन्त उठकर देवर्षि नारद जी को उचित आसन्न देकर बैठाया,तदोपरान्त भगवान श्री कृष्ण जी ने देवर्षि को वेदोक्त विधि से उनकी पूजा की, तत्पश्चात् देवर्षि नारद जी को भगवान् श्री कृष्ण जी ने अपने हाथों से यथोचित भोग प्रसाद ग्रहण कराया। गौरतलब है कि जब भगवान् ने यह महसूस कर लिया कि देवर्षि नारद जी अब पूरी तरह संतुष्ट हो गए हैं,तब भगवान ने देवर्षि नारद जी से पूछा कि देवर्षि ऐसे तो आप पूर्णकाम हैं, आपको किसी भी चीज की कोई आवश्यकता नहीं है,फिर भी मैं आपकी क्या सेवा कर सकता हूं ? फिर भगवान् श्री कृष्ण जी ने कहा कि देवर्षि यहां आकर हमे कृतार्थ किस कारण से किये। अब तो देवर्षि नारद जी ने भगवान् श्री कृष्ण जी से कहा कि प्रभु आपका दर्शन करने की अभिलाषा एवं आपके द्वारा द्वारिका में किए जा रहे कृत्यों को नजदीक से देखना चाहता था।प्रभु अब हमें द्वारिका के अन्य रमणीय जगहों पर जाने की आज्ञा दें।
उल्लेखनीय है कि रुक्मिणी जी के कक्ष से देवर्षि नारद जी एक दूसरी रानी के कक्ष में जब प्रवेश किया तो देखते हैं कि भगवान् श्री कृष्ण जी दूसरी पत्नी के साथ सेज पर बैठ कर चौसर खेल रहे हैं। अब तो स्वाभाविक तौर से भगवान् कृष्ण जी की नजर जब देवर्षि नारद जी पर पड़ी तो अनजान की तरह भगवान ने सुखद आश्चर्य चकित हो कर देवर्षि से आने के सम्बन्ध में प्रश्न पूछने के उपरान्त देवर्षि को वेदोक्त विधि से पूजा अर्चना करके, भगवान् ने स्वादिष्ट भोग प्रसाद ग्रहण कराया। तत्पश्चात देवर्षि ने भगवान से वार्तालाप करने के पश्चात अन्य पत्नी के कक्ष में जाने पर देखते हैं कि भगवान् श्री कृष्ण ब्राह्मणों एवं याचकों को गौ दान कर रहें हैं। तदोपरान्त अन्य रानी के कक्ष में प्रवेश कर देखते हैं कि भगवान् श्री कृष्ण अपने आत्म स्वरूप का ध्यान कर रहें हैं।यानि देवर्षि नारद जी, जिस जिस भी रानियों के कक्ष में गए, वहां पर भगवान् श्री कृष्ण जी को कुछ ना कुछ करते हुए उपस्थित पाए गए।
अब तो स्वाभाविक रूप से नारद जी बहुत ही आश्चर्य चकित हो कर सोचने लगे कि क्या मैं कोई स्वप्न तो नहीं देख रहा हूं ? तत्पश्चात उन्हें यह ज्ञात हुआ कि भगवान् तो सब जगह हैं, चाहे वह जड़ हो या चैतन्य, जिनके एक संकल्प करने मात्र से समूचे सृष्टि की रचना किया जा सकता है,तो भगवान श्री कृष्ण जी को एक ही समय में सभी रानियों के कक्ष में उपस्थित रहना कोई आश्चर्य की बात नहीं है।
आप सबों का,
दिवाकर,