यह विडंबना ही कहा जायेगा कि जब कोई भी देश में नेपाल बाढ़ जैसी भयावह त्रासदी आती है तो उस समय प्रभावित देश ही नहीं अन्य देश भी इस तरह की विपदा की पुनरावृति ना हो अपने देश के बौद्धिक सरकारी प्रतिनिधियों के माध्यम से त्रासदी संबंधी समस्याओं के निदान के लिये अपने स्तर पर ओजस्वी बौद्धिक बाते करते हैं, परन्तु कुछ महीने बीतने के साथ ही समस्या को ही समस्या बताकर पला झाड़ लेते हैं।
हालांकि बाढ़,भूकंप, भूस्खलन, हिमस्खलन जैसी आपदाएं प्राकृत आपदाएं मानी जाती है ,इसको पूरी तरह से रोका नहीं जा सकता है, परन्तु इस तरह की होने वाली आपदाओं से आम जनमानस को कम से कम कैसे छत्ती हो इस विषय पर हम अवश्य गंभीरता पूर्वक विचार कर सकते है।
उल्लेखनीय है कि नेपाल में आई त्रासदी विश्व के अन्य देशों के लिए कोई नई बात नहीं है। अब यहाँ विचार करना महत्वपूर्ण होगा कि नेपाल में बाढ़ क्यों आई ? इसका स्पष्ट उतर कोई भी समझदार भूवैज्ञानिक भी स्पष्ट तौर पर नहीं कह सकता है, परन्तु अनुमान के मुताबिक विभिन्न भूवैज्ञानिकों ने अपने अपने तरह से अपना दृष्टिकोण व्यक्त किया है। अनुमानतः अधिकतर भूवैज्ञानिकों का विचार है कि हिमस्खलन के कारण नेपाल में बाढ़ जैसी त्रासदी आई है। अब यहीं पर ग्लोबल वार्मिंग या पर्यावरण संरक्षण सम्बन्धी विषयों पर ध्यान देने के लिए भूवैज्ञानिकों के साथ विभिन्न देशों के सरकारों को भी विचार विमर्श करने के लिये प्रेरित करता है । अब यहाँ दूसरा प्रश्न यह उठता है कि हिमस्खलन को कैसे रोका जाए ?
गौरतलब है कि हिमस्खलन मुख्यतः बर्फ के पिघलने के कारण होता है,अब यहाँ एक अन्य सवाल उठता हैं कि क्या हिमस्खलन को रोका जा सकता है ? इसका जवाब मोटे तौर पर यही हो सकता है कि हिमस्खलन को पूरी तरह से रोका नहीं तो वैज्ञानिक तरीकों से पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूक होकर नियंत्रित अवश्य किया जा सकता है।
अब यहाँ एक अन्य प्रश्न खड़ा होता है कि हिमखंडों पर पर्यावरण संरक्षण के लिए कौन उपाय किया जा सकता है। विश्व के अनेक भूवैज्ञानिकों का कहना है कि भूगर्भिक मिट्टी की मदत से हिमखंडों पर पेड़ पौधों का रोपण कर आने वाले निकट भविष्य में हिमस्खलन के प्रभाव को कम किया जा सकता है। यहाँ हमें मोटे तौर पर नीचे के भूगर्भिक क्षेत्र से आधुनिक तकनीकी सहायता से हिमखंड प्रभावित क्षेत्रों में मिट्टी ले जाकर वहां उचित संख्या में पौधा रोपण कर हिमखंडों के पघिलने से बचाया जा सकता है।
उल्लेखनीय है कि पर्यावरण संरक्षण सम्बन्धी विषय कोइ एक देश की समस्या नहीं बल्कि यह बहुदेशीय समस्या है, अतः सभी प्रभावित ही नहीं बल्कि भविष्य के दृष्टिकोण से अप्रभावित देश भी आपस के सभी भेद भाव को भूलकर नेपाल में घटित त्रासदी की पुनरावृति रोकने के लिए एक वृहद स्तर पर अंतरराष्ट्रीय सेमिनार करने की आवश्यकता है।
। आप सबों का,
दिवाकर,