राजा परीक्षित जी, भागवत महापुराण की कथा सुनने के क्रम में महात्मा श्री शुकदेव जी से निवेदन करते हैं कि महात्मा जी हमें भगवान् श्री कृष्ण जी एवं उद्धव जी के उस महत्व पूर्ण संवाद के विषय को सुनाइए, जिसमे भगवान दत्तात्रेय जी एवं यदुवंश के पूर्ववर्ती राजा यदु जी के मुलाकात के अवसर पर जो दोनों के बीच हुए वार्तालाप को भगवान् श्री कृष्ण ने उद्धव जी को समझाने के उद्देश्य से उनके सामने प्रस्तुत किया था ?
गौरतलब है कि राजा परीक्षित जी के अनुरोध को स्वीकारते हुए महात्मा श्री शुकदेव जी ने बड़े ही रोचक ढंग से प्रस्तुत करते हुए कहा कि राजन एक समय की बात है कि यदुवंश के बहुत ही प्रतापी राजा यदु जी अपने राज्य के क्षेत्र में भ्रमण करने के लिए निकले हुए थे कि, उन्होंने देखा कि बहुत ही पुष्ट एवं मजबूत शरीर धारी व्यक्ति जिसके शरीर से एक दिव्य आभा मंडल प्रज्वलित हो रहा था, वह बेपरवाह एवं निश्चिंत होकर रास्ते के किनारे सोया हुआ था। तत्पश्चात राजा यदु ने अपने रथ से उतरकर उस शरीर धारी व्यक्ति के पास पहुंचे, जिसका नाम दत्तात्रेय जी था। वहां पहुंचकर राजा यदु जी ने दत्तात्रेय जी से पूछा कि महात्मा हमें आपको देखने से मालूम होता है कि आप ज्ञानी होने के साथ ही आप स्वस्थ भी हैं, परन्तु हमें आश्चर्य तो इस बात पर हो रही है कि जहाँ कोई भी व्यक्ति अपने परिवार एवं अपने कुटुंबो के पालन पोषण में दिन रात मेहनत करने के उपरांत भी अपने सभी संबंधियों को मनपसंद की इच्छा पूर्ति नहीं कर पाता है फिर भी आप इतने निश्चिंत एवं बेपरवाह होकर क्यों सोये हुए हैं,, कृपया हमें बताने का कष्ट करें !
उल्लेखनीय है कि राजा यदु जी के बातों को सुनकर भगवान दत्तात्रेय जी ने कहा कि राजन तुम्हारी बातों में सच्चाई है, परन्तु मेरे ज्ञान के अनुसार मनुष्य जितने भी कर्म या कुकर्म करता है वह अपने अज्ञानता के अनुसार ही करता है या उसे कोई सच्चे गुरु की प्राप्ति नहीं हुई है जिससे कि अपने अज्ञानता को समाप्त कर सके। जहां तक मेरी बात है तो राजन मैं अपने जीवन काल में 24 गुरुओं से शिक्षा प्राप्त की है, जिसमें प्राकृतिक तत्व से लेकर विदेह की पिंगला नामक चरित्र हीन औरत से लेकर कबूतर भी शामिल है। जिसका वर्णन मैं करता हूं, तुम एकाग्र चित होकर सुनो।
गौरतलब है कि राजा यदु जी ने भगवान् श्री दत्तात्रेय जी के बातों को सुनने लगे, जिसमें भगवान् ने आकाश मण्डल का उदाहरण देते हुए कहा कि राजन आकाश में कभी तारे, सितारे की चमचमाहट तो कभी आकाश से बिल्कुल गायब हो जाता है, कभी आकाश में बादलों द्वारा घेराव कर दिया जाता है तो कभी बिल्कुल आकाश साफ हो जाता है। फिर भी आकाश में कोई हलचल नहीं होती है । इससे भी मैं कुछ शिक्षा प्राप्त की। पृथ्वी से मैंने सिखा कि मनुष्यों या अन्य जीवों द्वारा अत्याचार करने के उपरांत भी उसकी स्थिति में कोई परिवर्तन नहीं होता है, वह यथावत अपने स्थान पर स्थित रहती है। उसके पश्चात् भगवान् श्री दत्तात्रेय जी ने कहा कि ऐसे तो मैने सब मिलाकर 24 गुरूओं से शिक्षा प्राप्त की थी परंतु जो सबसे महत्वपूर्ण शिक्षा संसारिक मनुष्यों के सम्बन्ध में है, वह कबूतर कबूतरी के परिवार के सम्बन्ध में है जो राजन तुम्हें बताता हूं, तत्पश्चात भगवान श्री दत्तात्रेय जी ने कहा कि राजन,एक घने जंगल में एक कबूतर अपनी पत्नी कबूतरी के संग रहता था, वह बड़ी ही मुश्किल से एक एक तिनका बटोरकर एक घोंसला का निर्माण किया, तथा कुछ समय पाश्चात्य कबूतरी ने गर्म धारण करने के पश्चात अपने घोंसला में अंडे को जन्म दिया, कुछ समय पाश्चात्य अंडे से बचे बाहर आ गए। तत्पश्चात कबूतर ने खूब मेहनत करके अपने परिवार के लिए खाना का व्यवस्था करता तथा आपस में बड़े प्रेम के साथ रहा करते थे। एक दिन एक बहेलिया आकर कबूतर के बच्चों को फसाया उसके बाद अफसोस करते हुए कबूतरी भी जाल में कूद गई, जब कबूतर ने देखा तो वह विलाप करते हुए उसने भी जाल में कूद गया कि बिना परिवार के जीने से क्या फायदा है। अतः राजन अज्ञानी अधिकतर संसारी मनुष्यों की यही स्थिति है।
आप सबो का,
दिवाकर ,