श्री भागवत महापुराण की कथा सुनने के क्रम में राजा परीक्षित जी, श्री शुकदेव जी से प्रश्न करते हैं कि महात्मा जी हमें यह बताएं कि श्री ब्रह्मा जी सहित अन्य देवताओं द्वारा क्यों भगवान् श्री कृष्ण जी को अपने मूल स्थान में निवास करने या प्रस्थान करने के लिए आग्रह करते हैं ?
उल्लेखनीय है कि राजा परीक्षित को के प्रश्नों को सुनकर महात्मा शुकदेव जी ने गंभीरता से उत्तर देते हुए कहा कि, राजन तुमको मैं पहले से ही बता चुका हूं कि माता पृथ्वी के अनुरोध करने पर श्री ब्रह्मा जी द्वारा जाकर भगवान् श्री विष्णु जी से अनुरोध किया था कि पृथ्वी पर अत्याचारी राजाओं एवं उनके अनुयायियों का अत्याचार बहुत ही बढ़ गया था। अतः उनके अनुरोध को स्वीकारते हुए ही भगवान् ने श्री कृष्ण जी के रूप में प्रकट होकर करीब करीब अपने उद्देश्यों के पूरा करने के नज़दीक पहुंच चुके थे।
गौरतलब है कि श्री ब्रह्मा जी एवं देवराज इंद्र सहित अन्य देवताओं ने महादेव शंकर जी के पास जाकर विचार विमर्श किया कि प्रभु हमलोगों को भगवान् श्री कृष्ण जी के दर्शन किए हुए बहुत दिन बीत गए हैं, क्यों ना द्वारिका पूरी चलकर साक्षात् भगवान् का दर्शन प्राप्त कर अपना जीवन सार्थक किया जाय। तत्पश्चात महादेव शंकर जी ने भी अपनी सहमति में सिर हिला दिया। उसके बाद सभी ब्रह्मा जी, श्री शंकर जी सहित सभी देवताओं द्वारा अपने अपने वाहनों से द्वारिका पूरी में भगवान् श्री कृष्ण जी के दर्शन करने के लिए प्रस्थान कर गए। समयानुसार भगवान् श्री कृष्ण जी से मुलाकात के बाद सभी देवताओं ने वैदिक रिति से भगवान् कृष्ण जी की पूजा अर्चना करने के पश्चात आग्रह किया कि प्रभु हमलोगों के आग्रह करने के पश्चात आप पृथ्वी पर जिस उद्देश्य की प्राप्ति के लिए अवतार ग्रहण किया था,, वह लगभग पूरा हो गया है। ऐसे तो प्रभु ब्रह्माण्ड में कोई भी जगह या तत्व नहीं है, जहाँ आपकी उपस्थिति नहीं है, सभी स्थानों पर आपको भक्ति पूर्वक ढूढ़ने में आप सभी जगह उपस्थित पाए जाते हैं। फिर भी हमलोग तो यही चाहते हैं कि आप अपने मूल स्थान में चलकर निवास करें, जिससे हमलोगों को आपकी सानिध्य का एहसास आसानी से होता रहे।
उल्लेखनीय है कि श्री ब्रह्मा जी, श्री शंकर जी एवं अन्य देवताओं की बातों को सुनकर भगवान श्री कृष्ण जी ने बहुत ही गंभीरता पूर्वक उतर देते हुए कहा कि तुमलोगों के बातों से मैं भी सहमत हूं कि मेरा मुख्य उद्देश्य लगभग पृथ्वी पर पूरा हो चुका है, परंतु कुछ उद्देश्य अभी तक शेष बचे हैं। तत्पश्चात भगवान श्री कृष्ण जी ने बल देकर कहा कि हमारे अपने कुल के ही यदुवंशियों द्वारा धन और ताकत के मद में अंधे होकर निर्बाध रूप से राज कर रहे हैं। हमे यह आशंका है कि मुझे पृथ्वी से अपने लोक में प्रस्थान करने के पश्चात ये लोग आस पास निवास करने वाले लोगों पर अत्याचार करके सताते रहेंगे तथा इसके लिए मेरी ही इच्छा से प्रेरित होकर संतों एवं महात्माओं द्वारा यदुवंशियों को समाप्त होने का श्राप दे दिया गया है। अतः मैं चाहता हूं कि यह सभी कुछ मेरे सामने ही घटित हो जाय, जिसके उपरांत मैं शांति पूर्वक अपने लोक के लिए प्रस्थान कर सकूँ। भगवान श्री कृष्ण जी की बातों को सुनकर सभी देवताओं ने अपने लोक के लिए प्रस्थान कर गए।
गौरतलब है कि भगवान श्री कृष्ण जी इस पूर्व प्रायोजित कार्यक्रम के बारे में उनके मित्र श्री उद्धव जी को पता चला तो, वे दौड़कर भगवान् श्री कृष्ण जी के पास आकर विलाप करते हुए कहा कि प्रभु जब से मैं होश संभाला हूँ,तब से मैं तो केवल आपके ही सान्निध्य में अपना जीवन व्यतीत किया हूँ, अतः प्रभु आप मुझे भी अपने लोक में ले चलने के लिए इजाज़त दिजिये। इसके पाश्चात्य भगवान् श्री कृष्ण जी ने उद्धव जी को शास्त्रीय विधि में समझाने का प्रयास किया।
शेष भाग अगले पोस्ट में,
आप सबो का,
दिवाकर ,