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।।भगवान् श्री कृष्ण जी के पौत्र अनिरुद्ध जी और बाणासुर की पुत्री उषा का मिलन,।।

महात्मा शुकदेव जी,श्री भागवत महापुराण की कथा सुनाने के क्रम में कहते हैं कि, राजन राजा बाणासुर अपने समय का बहुत ही प्रतापी राजा था तथा अपनी भक्ति द्वारा भगवान शंकर जी को उसने प्रसन्न कर लिया था। उल्लेखनीय है कि जब भगवान् शंकर जी अपना तांडव नृत्य कर रहे थे तो बाणासुर ने अपने हजार भुजाओं से भगवान् शंकर जी के नृत्य लय के अनुसार ताल लगाकर उनको प्रसन्न कर लिया था। गौरतलब है कि बाणासुर इतना शक्तिशाली था कि उसने हर जगह पर युद्ध करने के लिए उद्धत रहता था, परन्तु कोइ भी व्यक्ति उससे युद्ध करने के लिए तैयार नहीं होता था, यहां तक कि अपने भुजाओं को जिस पहाड़ या पर्वत पर पटकता था,वह चूर चूर हो जाता था। अंततः उसने भगवान् शंकर जी से कहा कि महादेव जी मेरे हजार भुजाओं का होना बेकार है,कोई भी प्राणी मुझसे युद्ध के लिए तैयार नहीं होता है। तत्पश्चात भगवान शंकर जी ने उससे कहा कि घबड़ाओ नहीं, समय आने पर तुम्हारा युद्ध करने संबंधी मनकामना जल्द ही पूरा हो जायेगा।

उल्लेखनीय है कि उसी कड़ी की भविष्य में पूर्ति हेतु,एक दिन रात के समय सोते हुए बाणासुर की पुत्री बहुत ही सावला, सलोना,एक सुन्दर युवक के साथ स्वप्न में उसके साथ अपने आप को समागम करते हुए देखा।जब सुबह बाणासुर की पुत्री उषा की नींद खुली तो वहां कोई भी उपस्थित नहीं था। विडंबना तो यह था कि बाणासुर की पुत्री उषा जिस युवक के साथ अपने आप को समागम होते हुए देखी थी,वह युवक कौन था ? उसको वह पहचानती नहीं थी,केवल उसके मन मस्तिष्क में उसके चेहरे की आकृति उसको याद थी। संजोग वश वाणासुर के मंत्री की पुत्री चित्रलेखा,जो चित्रकला में काफी पारंगत थी, उषा के कक्ष में सहेली के नाते उनसे मिलने के उद्देश्य से गई। कक्ष में प्रवेश करते ही चित्रलेखा ने उषा से पूछा कि क्या बात है सखी ,आज काफी उदास देखने में तुम लग रही हो, कोई भी समस्या हो बिना किसी प्रकार झिझक के हमसे कह सकती हो! अब तो स्वाभाविक रूप से उषा ने कुछ शर्माते हुए स्वप्न में घटित हुई घटनाओं को विस्तार से चित्रलेखा के सामने वर्णन कर दिया। तत्पश्चात उस युवक का हावभाव एवं रूप के संदर्भ में चित्रलेखा ने उषा से पूछना शुरू किया। गौरतलब है कि ऊषा के बतलाये हुए काल्पनिक रूप के अनुसार चित्रलेखा ने वसुदेव जी, कृष्ण जी, प्रद्युम्न जी का चित्र बनाया,परन्तु उन सब से उस युवक का रूप मेल नहीं खाता था। अंततः चित्रलेखा ने अनिरुद्ध जी का चित्र बनाकर उषा के पास प्रस्तुत किया तो , उषा ने खुशी से चहकते हुए कहा कि सखी यही वह युवक है,जिसके साथ स्वप्न में मैं समागम किया था। तत्पश्चात उषा ने चित्रलेखा से कहा कि सखी तुम तो सभी प्रकार की माया संबंधी विद्या को जानती हो,इस युवक से मुझे मिला दो,इसके बिना मैं नहीं रह सकती हूं। उषा की बातों को गंभीरता पूर्वक सुनकर चित्रलेखा ने उतर दिया कि मुझे इस युवक का पता लगाने के लिए कुछ समय चाहिए। उल्लेखनीय है कि कुछ ही समय में चित्रलेखा ने यह जानकारी प्राप्त कर लिया कि वह काल्पनिक युवक भगवान् श्री कृष्ण जी का पौत्र अनिरुद्ध जी हैं,जो कि द्वारिका नगरी में निवास करते हैं। चित्रलेखा ने प्राप्त किए हुए जानकारी को उषा के पास कह दिया।अब स्वाभाविक रूप से उषा ने उस युवक से मिलने के लिय चित्रलेखा से आग्रह करने लगी। तत्पश्चात चित्रलेखा ने अपने योगमाया विद्या के बल से उस युवक को सशरीर उषा के कक्ष में लाने का वादा उषा से कर दिया।

तत्पश्चात रात के समय चित्रलेखा द्वारा आकाश मार्ग से द्वारिका नगरी। जाकर अनिरुद्ध जी के कक्ष में जाकर उनको सोते हुए उठाकर ,रातोंरात सीधे उषा के कक्ष में पहुंचा दिया। उल्लेखनीय है कि जब अनिरुद्ध जी को आंख खुली तो वे अपने आप को एक अनजान कक्ष में सुंदर युवती के पास देखकर घबड़ा गए। तत्पश्चात बड़े ही प्यार से उषा ने स्वप्न में अपने साथ घटित सभी घटनाओं का वर्णन कर दिया। अब तो समय के अनुसार अनिरुद्ध जी भी उषा के प्यार में धीरे धीरे बांधने लगे।कुछ समय बीतने के पश्चात् उषा की शारीरिक हावभाव देखकर दरबारियों को कुछ शंका उत्पन्न होने लगी। इसके पाश्चात्य कुछ अनहोनी ना हो जाए,इस डर से राजकुमारी उषा के सम्बन्ध में राजा बाणासुर से शिकायत की।अब तो स्वाभाविक रूप से गुस्सा में लाल होकर बाणासुर द्वारा सीधे अपनी पुत्री उषा के कक्ष में प्रवेश करने करने के उपरांत अनिरुद्ध को देखकर ,बाणासुर ने बिना कुछ सोचे समझे अनिरुद्ध जी को बंदी बनाने का आदेश अपने सैनिकों को दिया।

गौरतलब है कि अनिरुद्ध जी ने बहुत ही बहादुरी पूर्वक उन सैनिकों को खेल खेल में ही हरा दिया,परन्तु अंततः उनको नागपाश से बांध दिया गया।इस बात की सूचना द्वारिका में जाकर देवर्षि नारद जी द्वारा भगवान् श्री कृष्ण जी को दी गई, तत्पश्चात सभी द्वारिका वासियों द्वारा भगवान् कृष्ण जी के साथ युद्ध करने के सम्बन्ध में तैयारी करने लगे।

शेष अगले पोस्ट में,

आप सबों का,

दिवाकर ,

ND

Nandkumar Diwakar

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Nandkumar Diwakar is an avid researcher and writer dedicated to sharing authentic knowledge, insights, and perspectives through this blog platform.

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