राजा परीक्षित जी ने, श्री भागवत महापुराण की कथा सुनने के क्रम में महात्मा शुकदेव जी से प्रश्न करते हैं कि महात्मा जी हमें ये बताए कि भगवान् शंकर तो कृष्ण भगवान् के अनन्य भक्त थे,तो किस कारण से उनको अपने आराध्य देव यानी भगवान श्री कृष्ण जी से युद्ध करना पड़ा ? अब महात्मा शुकदेव जी राजा परीक्षित जी के प्रश्नों के प्रत्युत्तर में कहते हैं कि , राजन भगवान् हमेशा भक्तों के अधीन होते हैं,वे चाहे भगवान श्री विष्णु जी हों या भगवान शंकर जी हों, वे हमेशा अपने भक्तों के अधीन ही रहकर कार्य करते हैं। यहां तक कि माता लक्ष्मी जी हों या माता पार्वती जी हों, उनलोगों को भी स्थान हमेशा कोई भक्त के बाद ही आता है,फिर तो राजन संजोग वश अपने आराध्य देव का भी स्थान इसी कड़ी में जुड़ जाता है।
उल्लेखनीय है कि भगवान् श्री शंकर जी अपने तांडव नृत्य के दौरान बाणासुर द्वारा अपने हजार भुजाओं द्वारा उनके नृत्य ताल के साथ ताल मिलाया था, जिससे खुश होकर भगवान् शंकर ने हर मुश्किल वक्त में रक्षा करने का आश्वासन दिया था।
अब हम पूर्व में घटित घटनाओं का कुछ उल्लेख करेंगे, जैसा कि पिछले पोस्ट में मैने वर्णन किया था कि बाणासुर की पुत्री उषा और भगवान कृष्ण जी के पौत्र अनिरुद्ध जी के मिलन के उपरांत दरबारियों द्वारा दी गई सूचना के उपरांत बाणासुर के आदेश उपरांत उसके सैनिकों द्वारा कुछ समय तक अनिरुद्ध जी से युद्ध करने के पश्चात उनको नागपाश से बांध दिया गया।
गौरतलब है कि सूचना जब देवर्षि नारद जी द्वारा द्वारिका नगरी जाकर भगवान् श्री कृष्ण जी एवं अन्य द्वारिका वासियों को सुनाया गया, तत्पश्चात भगवान् श्री कृष्ण जी, भगवान श्री बलराम जी,प्रद्युम्न जी एवं सभी यदुवंशियों के साथ युद्ध करने के उद्देश्य से बाणासुर के राज्य शोणितपुर पहुंचकर अपने सैनिकों के साथ चारों तरफ से घेर लिया। तत्पश्चात इस बात की सूचना जब बाणासुर को प्राप्त हुआ तो उसने बिना कोई देरी किए अपने सैनिकों के साथ लिए भगवान कृष्ण जी के सामने उनको ललकारते हुए आ गया।अब तो दोनों ओर से घमासान युद्ध होने लगा ।भगवान प्रद्युम्न जी और भगवान कार्तिकेय जी एक दूसरे के विरुद्ध युद्ध लड़ रहे थे। भगवान् श्री कृष्ण जी और बाणासुर दोनों आमने सामने एक दूसरे के विरुद्ध युद्ध लड़ रहे थे,भगवान श्री कृष्ण जी बाणासुर के प्रत्येक अस्त्र शस्त्र को बहुत ही आसानी से मात दे रहे थे। उल्लेखनीय है कि सभी को आश्चर्य तो तब हुआ जब भगवान श्री शंकर जी बाणासुर के तरफ से लड़ने के लिए युद्ध भूमि में कृष्ण जी के विरुद्ध कूद गए। अब तो स्वाभाविक रूप से भगवान् कृष्ण जी बहुत ही संकोच में पड़ गए ! भगवान् श्री कृष्ण जी,भगवान शंकर जी के कुछ अस्त्र शस्त्र को निष्फल करने के उपरांत,भगवान शंकर जी के विरुद्ध जंभाई उत्पन्न करने वाला शस्त्र से निशाना साधकर उनको जंभाई लेने पर मजबूर कर दिया।
गौरतलब है कि अब मौका पाकर भगवान श्री कृष्ण जी ने बाणासुर को एक एक भुजाएं काटकर उसको मृत्यु के घाट उतारना चाहते थे,त्योंहि भगवान् शंकर जी बीच में आकर भगवान् श्री कृष्ण जी के सामने देवत्व भाव से स्तुति करते हुए कहा कि प्रभु क्या करू मै भी बाणासुर की भक्ति से मजबूर होकर ना चाहते हुए भी आपसे युद्ध करने को मजबूर हुआ। तत्पश्चात भगवान श्री कृष्ण जी ने शंकर जी से कहा कि महादेव जी हम तो आप ही के आज्ञा का पालन करते हुए इसके भुजाओं को काट रहे थे,अब मै इसे आपके आदेशानुसार अभय दान कर देता हूं।
उल्लेखनीय है कि राजा बाणासुर द्वारा भगवान् श्री कृष्ण जी की वेदोक्त विधि से पूजा अर्चना करके अपनी पुत्री उषा और अनिरुद्ध जी का विवाह कर के बहुत से बहुत से रत्नों मणियों के साथ द्वारिका के लिए बिदा किया।
आप सबों का,
दिवाकर,