महात्मा शुकदेव जी, भागवत महापुराण की कथा राजा परीक्षित जी को सुनाते हुए कहते हैं कि राजन हस्तिनापुर के राजकुमार दुर्योधन अपनी पुत्री लक्ष्मणा की शादी के लिए एक स्वयंवर समारोह का आयोजन अपनी राजधानी इंद्रप्रस्थ में किया था। वहां कई देशों के राजकुमार उस समारोह में सम्मिलित होने के लिए आये हुए थे, परन्तु देखते ही देखते जांबवती नंदन सांब ने भरी हुई स्वयंवर सभा से राजकुमारी लक्ष्मणा को वहां से उठा ले गए।अब तो स्वाभाविक रूप से पूरे हस्तिनापुर में खलबली मच गया। तत्पश्चात राजकुमार दुर्योधन ने अपने सैनिकों को तुरन्त जांबवती नंदन सांब को गिरफ्तार करने का आदेश दिया। उल्लेखनीय है कि सांब अकेले ही दुर्योधन के सैनिकों के साथ बड़े बहादुरी पूर्वक लड़े,परन्तु उन विशाल सैनिकों के समूह के समक्ष अधिक समय तक सांब टिक नहीं सके। अंततः सांब को दुर्योधन के सैनिकों द्वारा कैद कर लिया गया।
गौरतलब है कि इस घटना का समाचार जैसे ही देवर्षि नारद जी को पता चला, वैसे ही देवर्षि नारद जी द्वारा द्वारिका पूरी जाकर उस सांब के साथ घटित घटनाओं के सम्बन्ध में भगवान् श्री कृष्ण एवं अन्य यदुवंशियों के समक्ष वर्णन कर दिया। अब तो स्वाभाविक तौर से भगवान् कृष्ण जी सहित पूरे यदुवंशियों ने यथाशीघ्र हस्तिनापुर पर चढ़ाई कर उनके साथ युद्ध करने के सम्बन्ध में विचार विमर्श करने लगे। तत्पश्चात भगवान बलराम जी ने वहां आकर भगवान् श्री कृष्ण जी एवं अन्य यदुवंशियों को समझाते हुए कहा कि देखो युद्ध करने से ही कोई समस्या का समाधान नहीं होता है। ऐसे भी जिसके विरुद्ध युद्ध करने की बात तुमलोग कर रहे हो,वे हमारे अपने रिश्तेदार ही तो हैं,साथ ही भगवान बलराम जी ने उनको समझाने के अंदाज में कहा कि अगर किसी भी व्यक्ति का किसी प्रकार कोई प्रतिष्ठा में हनन होता है तो वह अपना आपा खो देता है,उसे अपने और पराये का ज्ञान उस समय नहीं होता है। अभी तुमलोग युद्ध करने के सम्बन्ध में विचार विमर्श को कुछ समय के लिए त्याग दो। मैं वहां जाकर उस घटना से संबंधित हस्तिनापुर वासियों को पहले समझाने का प्रयास करता हूं।
गौरतलब है कि अगले दिन भगवान् बलराम जी अपने कुछ वरिष्ठ यदुवंशियों एवं कुछ ब्राह्मणों के साथ हस्तिनापुर के लिये प्रस्थान कर दिया।शाम ढलने से कुछ पहले ही वहां पहुंचकर, शहर के बाहर एक उपवन में अपने सभी सहयोगियों के साथ डेरा जमाया।कुछ समय के उपरांत राज्य के किसी सेवक द्वारा बलराम जी के आने के सम्बन्ध में दुर्योधन सहित अन्य राज्य के प्रमुख जिम्मेदार राज दरबारियों को सूचना दिया गया,सूचना प्राप्त होने के उपरांत दुर्योधन एवं उसके अनुचरों द्वारा काफी हर्ष का अनुभव हुआ।तदुपरांत उन सभी दुर्योधन के राज्य अधिकारियों द्वारा यह निर्णय लिया गया कि उपवन में चलकर भगवान बलराम जी का यथोचित स्वागत सत्कार किया जाय। उल्लेखनीय है कि निर्णय के अनुसार दुर्योधन के सभी प्रिय अनुचरों द्वारा उपवन में जाकर भगवान बलराम जी का काफी स्वागत सत्कार के साथ उनका वेदोक्त विधि से पूजा अर्चना भी किया गया। तत्पश्चात बलराम जी ने अपने यहां आने का उद्देश्य व्यक्त करते हुए कहा कि मथुरा के राजा उग्रसेन जी का सन्देश है कि सांब और लक्ष्मणा की शादी करके सम्मानपूर्वक द्वारिका पूरी के लिए विदा किया जाय।
उल्लेखनीय है कि जब राजकुमार दुर्योधन को बलराम जी के दिए गए संदेश के बारे में उसके अनुचरों द्वारा पता चला तो वह गुस्से से लाल होकर बलराम जी और समस्त यदुवंशियों के विषय में अनाप शनाप बोलने लगा। गौरतलब है कि दुर्योधन ने यहाँ तक कहा कि ये ग्वाले हमलोगों के बल पर ही राजकीय चिन्ह के साथ में राजा की उपाधि भी प्राप्त किए हैं, यहां तक कि उनलोगों पर हमलोग दया बस रिश्तेदारी भी की है,और आज उन ग्वालों द्वारा अपना औकाद भूलकर हमसे बराबरी पूर्वक रिश्ता जोड़ने की पुनः बात कर रहे हैं।
गौरतलब है कि दुर्योधन द्वारा कही गई बातों के बारे में जानकारी बलराम जी को प्राप्त हुआ तो उन्होंने क्रोध पूर्वक पश्चाप करते हुए कहा कि मैं ही मूर्ख था ,जो यदुवंशियों द्वारा हस्तिनापुर पर चढ़ाई कर युद्ध करने संबंधी योजना को स्थगित करवा दिया। अब तो हमे हस्तिनापुर के राज्य होने का घमंड राजकुमार दुर्योधन को समाप्त करना होगा। उल्लेखनीय है कि भगवान् बलराम जी ने निर्णय लिया कि पूरे हस्तिनापुर को गंगा नदी में डूबा दूँगा। इसी संकल्प की पूर्ति हेतु भगवान बलराम जी ने अपने दिव्य हल मूसल से हस्तिनापुर की धरती को खींचने लगे तो समस्त हस्तिनापुर में खलबली उत्पन्न हो गई।अब तो दुर्योधन एवं उसके मंत्रियों के बीच इस बात का भय उत्पन्न होने लगा कि अगर बलराम जी को किसी प्रकार नहीं मनाया जाता है तो पूरी नगरी ही डूब जायेगी, जिससे कि हस्तिनापुर साम्राज्य खत्म हो जायेगा।
अब तो स्वाभाविक तौर पर राजकुमार दुर्योधन एवं उसके वरिष्ठ सलाहकारों द्वारा भगवान बलराम जी के पास जाकर काफी अनुनय विनय किया, तत्पश्चात भगवान बलराम जी ने हस्तिनापुर को अभय प्रदान कर दिया। तत्पश्चात दुर्योधन ने अपनी पुत्री लक्ष्मणा और सांब का विवाह कर खुशी खुशी काफी मात्रा में कीमती उपहार देकर विदा किया।
आप सबों का,
दिवाकर ,