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General Knowledge 1 min read

।। 14 सितम्बर को हिंदी दिवस मनाना महज औपचारिकता, इसके अतिरिक्त कुछ नहीं ! ।।

प्रत्येक वर्ष की भांति इस वर्ष भी हिंदी दिवस के औसर पर सरकारी कार्यालयों से लेकर निजी कार्यालयों के द्वारा काफी अपने पहुंच के अनुसार सोशल मीडिया से लेकर प्रिंट मीडिया या इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के माध्यम से प्रचार प्रसार किया गया। परन्तु यह विडंबना ही कहा जायेगा कि प्रचारित करने वाले ज़्यादातर उसके कुछ प्रमुख अधिकारियों को खुद नहीं मालूम है कि आखिर हिदी दिवस क्यों मनाया जाता है? और इसका क्या महत्व है ?

अब मै इसके महत्व के विषय में बताता हूं , हमारे संविधान सभा में 14 सितम्बर 1949 को हिंदी भाषा को अंगीकार करने के पश्चात उस तिथि से आज तक प्रत्येक वर्ष 14 सितम्बर को हिंदी दिवस के रूप में मनाते हैं।

उल्लेखनीय है कि इस अवसर पर संविधान सभा में बोलते हुए डॉ भीम राव अंबेडकर ने कहा था कि मैं जानता हूं कि संपूर्ण भारत देश में विभिन्न क्षेत्रों में विभिन्न प्रकार की भाषाएँ बोली जाती है, साथ ही बाबा साहब ने कहा कि हम चाहते हैं कि भारत में एक ऐसी संपर्क भाषा हो जो पूरे देश में बोली जाए तथा इसके माध्यम से कला संस्कृति का प्रचार एवं प्रसार हो। इसलिए हिंदी को राष्ट्र भाषा के रूप में दर्जा प्राप्त हो।

गौरतलब है कि भारतीय संविधान सभा में इस बात पर जोर दिया गया था कि कुछ विशेष प्रस्थिति में ही कार्यालयों या न्यायालयों में अंग्रेजी भाषा में कार्य कलाप होगा। इसके लिए राज्य सरकार या केंद्र सरकार के स्तर पर हिंदी भाषा में कार्य कलाप की जांच करने के उद्देश्य से एक अलग विभाग या मंत्रालय होगा जो अपने विभागीय पदाधिकारियों के माध्यम से या प्रत्येक विभाग के लिए अपने मंत्रालय द्वारा गठित समिति के माध्यम से ना केवल जाँच करेगा, बल्कि प्रत्येक कार्यालय में हिंदी भाषा में अधिक से अधिक कार्य हो इसके लिए समय समय पर मार्गदर्शन देते रहना भी था।

परन्तु यह विडंबना ही कहा जायेगा कि हिन्दी को राष्ट्र भाषा के दर्जा प्राप्त होने के बाद भी ना तो दक्षिण भारत या पूर्वोत्तर भारत में हिंदी भाषा के प्रति कोई रुचि देखने को नहीं मिलता है। अब तो स्वाभाविक तौर से जब स्कूलों और कॉलेजों में जब विद्यार्थियों को हिंदी भाषा का ज्ञान ही नहीं कराया जाएगा तो आने वाले निकट भविष्य में वे कैसे हिंदी भाषा में कार्य करेंगे।

गौरतलब है कि हिंदी भाषा का विकास एवं ज्ञान ना केवल अभिव्यक्ति का माध्यम है, बल्कि उतर भारत की संस्कृति एवं दक्षिण भारत की संस्कृति को जोड़ने में भी अपना प्रभाव स्थापित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। मुझे यह कहने में कोई झिझक नहीं है कि आज तक कभी भी सांस्कृतिक दृष्टि से उतर भारत एवं दक्षिणी भारत के साथ पूर्वी भारत के लोग एकजूट महसूस नहीं किए। इसका मुख्य कारण अभिव्यक्ति का माध्यम राष्ट्रीय स्तर पर हिंदी भाषा का ज्ञान नहीं होना। अब तो स्वाभाविक तौर पर कहा जा सकता है कि जब हम एक दूसरे को बात चित के माध्यम से ही जानते हैं, तथा एक दूसरे को अपना भाव प्रकट कर अपनापन का एहसास भी करते हैं।

यहां यह भी उल्लेखनीय है कि भला हो संघ लाेक सेवा से पास अधिकारियों को जिसमे यह प्रावधान किया गया है कि उतर भारत के अधिकारियों को अंग्रेजी भाषा के साथ दक्षिण भारत के क्षेत्रीय भाषा का ज्ञान प्राप्त होना अनिवार्य होगा, वहीं दूसरी तरफ दक्षिण भारत के अधिकारियों को हिंदी विषय का ज्ञान होना अनिवार्य होगा। मेरा यहां उल्लेख करने का मुख्य उद्देश्य है कि सीमित स्तर पर अधिकारियों के माध्यम से प्रत्यक्ष रूप में एक क्षेत्र से दूसरे क्षेत्र के संस्कृति या रहन सहन को समझने का मौका मिलता है। जिसे भाषायी आधार पर क्षेत्र की दृष्टि से संकुचित मानसिकता का लोप होता है।

लेकिन इस स्तर पर पुरे देश में सांस्कृतिक एकजुटता नहीं लाया जा सकता है, जरूरत है कि लोक सभा में एक विशेष क़ानून बनाकर यह प्रावधान करना होगा कि देश के किसी भी हिस्सा में स्कूल या कॉलेजो में हिंदी भाषा का ज्ञान प्राप्त करना अनिवार्य होगा, तभी इस विषय में प्रगति हो सकती है।

महज होर्डिंग, पोस्टर या कमिटी द्वारा तो केवल हिन्दी दिवस मना सकते हैं, हिंदी भाषा का विकास नहीं कर सकते हैं।

आप सबों का,

दिवाकर,

ND

Nandkumar Diwakar

Author & Founder, Radha Krishan Global Knowledge

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Nandkumar Diwakar is an avid researcher and writer dedicated to sharing authentic knowledge, insights, and perspectives through this blog platform.

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