अभी 26 अगस्त को नेपाल में आई वीभत्स बाढ़ से ना केवल वहां की आम जनमानस सहित वहां की सरकार को झकझोर कर रख दिया, बल्कि विश्व के उसके पड़ोसी देशों सहित अन्य देश भी काफी आहत हुए हैं। गौरतलब है कि नेपाल के सिकुया जिला की सीमा जो चीन के समीप तिब्बत से लगती है ,वहां अचानक भूस्खलन एवं हिमस्खलन के कारण हिंडन नदी में कीचड़ युक्त जल से बाढ़ आ गया,वही पानी नेपाल के त्रिशूली नदी एवं भोटेकोशी नदी में भारी मात्रा में चली गई,जिसके कारण वहां नदियों के किनारे बसे हुए बस्तियों को काफी क्षति पहुंचा।यही नहीं , यह भी बताया जाता है कि रास्ते में पड़ने वाले मध्यम एवं बृहद स्तर के कई पुलों को बहाकर ले गया है। उल्लेखनीय है कि इस भीषण बाढ़ से लगभग 150 से अधिक लोगों के मरने तथा 750 से अधिक लोगों को लापता होने की सूचना है। सूत्रों की मानें तो इसमें 27 देशों के विदेशी पर्यटक शामिल हैं, जिसमे भारतीय पर्यटकों की संख्या सबसे अधिक है।
उल्लेखनीय है कि इस संकट की घड़ी में भारत ,चीन, पश्चिमी यूरोपीय देशों ने अपने स्तर से संवेदना व्यक्त करने के साथ ही हर संभव तरीके से नेपाल सरकार एवं वहां की जनता को मदत करने का आश्वासन दिया है। यही नहीं विश्वस्त सूत्रों की माने तो भारत सरकार अग्रिम तौर पर 10 हजार टन खाद्यान्न भी नेपाल में सहायता के तौर पर भेज दिया है,तथा आगे भी जरूरत के अनुसार हर संभव मदत पहुंचाने का आश्वासन नेपाल सरकार को दिया है। गौरतलब है कि इस अवसर पर भारतीय माननीय प्रधानमंत्री यशस्वी श्री नरेंद्र मोदी जी ने नेपाली प्रधानमंत्री माननीय बालेंद्र शाह से फोन पर बात कर अपनी संवेदना व्यक्त की तथा उनको ढाढ़स बढ़ाया। तत्पश्चात नेपाली प्रधानमंत्री श्री बालेंद्र शाह ने भरे गले से कहा कि संकट की घड़ी में आखिर पड़ोसी देश ही एक दूसरे की मदत करता है।
यह विडंबना ही कहा जायेगा कि इसी समय चीन देश में पड़ने वाले कैलाश मानसरोवर की धार्मिक यात्रा के लिय गए लगभग 400 से अधिक यात्रियों का सम्पर्क अन्य लोगों से कट गया है,जो काफी चिंता जनक है। विशेषज्ञों के अनुसार कैलाश मानसरोवर की यात्रा तिब्बत सीमा से होकर करना पड़ता है,अभी इस समय नेपाल में जो बाढ़ आई है,उसका शुरुआत तिब्बत से ही हुआ है।यह भी सम्भावना जताया जा रहा है कि बाढ़ के कारण वहां की संचार व्यवस्था अस्त व्यस्त हो गया होगा, अतः यह स्वाभाविक ही होगा कि इसके कारण भारतीय कैलाश मानसरोवर जाने वाले पर्यटकों को अन्य नागरिकों या अन्य देशों से सम्पर्क करना मुश्किल हो गया होगा।
यहां यह उल्लेखनीय होगा कि नेपाल हो या भारत समेत अन्य दुनियां के देशों में साल नहीं तो दो चार सालों के अंतराल पर नेपाल जैसी भीषण बाढ़ , भूकंप या भूस्खलन, हिमस्खलन जैसी तबाही कहीं ना कहीं देखने को जरूर मिलती है, परन्तु ना तो प्रभावित देशों की सरकारों द्वारा और ना ही वहां की आम जनमानस द्वारा ही इस विषय में पुनरावृति ना हो इस पर कोई ध्यान दिया जाता है। गौरतलब है कि इस विषय में पर्यावरण प्रेमियों एवं भूगर्भ वैज्ञानिकों का स्पष्ट मंतव्य है कि बाढ़, भूकंप या भूस्खलन जैसी घटनाओं को नियंत्रण करने का मात्र एक ही विकल्प है कि हमें पर्यावरण के प्रति सजग रहने की आवश्यकता है। उल्लेखनीय है कि संयुक्त राष्ट्र संघ के तरफ से समय समय पर पर्यावरण संरक्षण सम्बन्धी सेमिनारों के माध्यम से इस विषय में पर्यावरण प्रेमियों द्वारा कई बार आशंका जतायी है कि जिस अनुपात में जंगलों की कटाई हो रही है, उस अनुपात में वृक्षारोपण नहीं किया जा रहा है।उन पर्यावरण वैज्ञानिकों ने पहले ही यह चेतावनी दे दिया था कि अगर काटे गए वृक्षों के अनुपात में वृक्षारोपण नहीं किया गया तो वह दिन दूर नहीं जब हम आए दिन कहीं ना कहीं बाढ़, भूस्खलन, हिमस्खलन जैसी तबाही को देखने को मजबूर हो जायेंगे। हमारे समझ से उन पर्यावरण प्रेमियों एवं वैज्ञानिकों की आशंका नेपाल में हुए तबाही को देखकर सही साबित होता है।
आप सबो का,
दिवाकर,