यह हमारे देश के लिये दुर्भाग्य की बात है कि आजादी के लगभग 80 वर्ष व्यतीत होने के बाद भी भारतीय नगरों,महानगरों की स्थिति गंदगी के मामले में आज भी चिन्ता जनक बनी हुई है। यहां ध्यान देने की बात है किसी भी देश के विकास का पैमाना राष्ट्रीय पर्यटकों या अंतरराष्ट्रीय पर्यटकों की दृष्टिकोण से उस देश की शहरों की साफ सफाई से ही लगाया जाता है।
गौरतलब है कि हमारे देश में प्रति वित्तीय वर्ष में चाहे केंद्र की सरकार हो या राज्यों की सरकार हो नित्य नए स्तर के एक नया नगर स्थापित करने का तो योजना बनाया जाता है, परंतु पुराने नगरों की साफ सफाई सुव्यवस्थित कैसे हो ? इस पर अभी तक कोई विशेष ध्यान नहीं दिया जा रहा है। मैं यहां कुछ प्रसिद्ध नगरों एवं कुछ विशेष धार्मिक नगरों का उल्लेख कर रहा हूं, जहां गंदगी के मामले में विश्व स्तर पर अपना कीर्तिमान बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। उदाहरणतः दिल्ली, मुम्बई पटना, वृंदावन मथुरा, वाराणसी हरिद्वार इत्यादि शहर जहां आम तौर पर जगह जगह कुडो का ढेर, नगर निगम द्वारा बनाए हुए सार्वजनिक शौचालय में से फैल रहे दुर्गंध वहां से आते जाते व्यक्तियों को आम तौर पर महसूस होता है। यही नहीं उन इंगित नगरों में जगह जगह गौ वंशों द्वारा बिखेरे गए गोबर को देखा जा सकता है। मेरे कहने का मतलब इतने शहरों के लिए सिर्फ नहीं है।ऐसा नहीं है कि दक्षिण भारत या पूर्वोत्तर भारत के नगर पूरी तरह साफ सफाई से युक्त हैं। मैं तो केवल छोटा सा उदाहरण देकर समझाने का प्रयास कर रहा हूं
उल्लेखनीय है कि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 243 q के अनुसार भारत में शहरों के समुचित सुव्यवस्था के लिए नगर निगम या छोटे शहरों की सुव्यवस्थित देख भाल के लिए नगर पालिका के गठन का प्रावधान किया गया है। यहाँ यह उल्लेख कर देना उचित होगा कि उपरोक्त अनुच्छेद के अनुसार केंद्र सरकार या राज्य सरकारों द्वारा समय समय पर नगर निगम या नगर पालिका के गठन किया भी गया है।यही नहीं इन शहरों के व्यवस्थित संचालन के लिय केंद्र सरकार से लेकर राज्य सरकार तक नगर विकास विभाग नामक मंत्रालय भी बनाया गया है । गौरतलब है कि इस मंत्रालय का मुख्य कार्य नगरों की साफ सफाई, के साथ साथ सौंदर्यीकरण करना होता है। यह विडम्बना ही कहा जायेगा कि प्रति वित्तीय वर्ष में इस विभाग में करोड़ो रुपए आवंटित किया जाता है, परंतु भारत की अधिकांश नगरों की स्थिति विगत दस वर्षों से कोई विशेष परिवर्तन देखने को नहीं मिला है।
हमारे समझ से इसका मुख्य कारण हम आम जनता के बीच जागरूकता की कमी है। यहां यह बात उल्लेखनीय है कि आम साधारण जनता की बात कौन करे जो अपने आप को काफी पढ़े लिखे बुद्धिजीवी वर्ग के श्रेणी में रखते हैं,अगर वे महाशय किसी नगर में किसी रास्ते से गुजरते हुए अगर उनको फैली हुई गंदगी दिख भी जाय तो वे संबंधित अधिकारी को ना तो लिखित कोई शिकायत करते हैं और ना तो कहीं मौखिक ही शिकायत करते हैं। हां इतना उन बुद्धिजीवी महाशय को अपने दोस्तों के साथ वार्तालाप करते हुए अवश्य सुना जाता है कि अमुक शहर में तो बहुत ही गंदगी फैली हुई है।
याद रहे कि भारतीय शहरों के साफ सफाई एवं सौंदर्यीकरण के लिए कोई अलग से मशीनीकरण स्थापित करने की आवश्यकता नहीं है। जरूरत केवल आम नागरिकों के साथ जन प्रतिनिधियों को भी जागरूक होने की है।