श्री भागवत महापुराण की कथा सुनने के क्रम में राजा परीक्षित जी ने महात्मा श्री शुकदेव जी से प्रश्न किया कि, महात्मा जी ऐसे तो भगवान् अनंत हैं तथा उनकी कथाएं भी अनंत हैं। कोई भी व्यक्ति अनेकों जन्म लेकर भी भगवान् की अनंत कथाओं का वर्णन नहीं कर सकता है, परन्तु हमें भगवान् की ऐसी कथाओं का वर्णन कीजिए जिसमें भगवान् श्री हरि विष्णु जी के कला अवतार ग्रहण करने के कारण या उनकी कार्य कलाप से देवराज इंद्र विशेष रूप से चिन्तित हुए हों।
गौरतलब है कि राजा परीक्षित जी के प्रश्नों को सुनकर महात्मा शुकदेव जी ने विचार पूर्वक गंभीर वाणी में उतर देते हुए कहा कि राजन सारा ब्रह्माण्ड श्री विष्णु जी में समाहित है, सृष्टि का आरंभ उन्हीं से शुरू होता है और उन्हीं में समाहित हो जाता है। समय समय पर अपने भक्तों के कल्याण हेतू भगवान् श्री विष्णु जी आवश्यकता के अनुसार अपना अंश कला अवतार ग्रहण कर अपने लीलाओं के माध्यम से भगवान् अपने भक्तों का कल्याण कर अपने मूल स्वरूप में वापस चले जाते हैं, तत्पश्चात फिर आवश्यकता पड़ने पर अपना अंश कला अवतार ग्रहण करते हैं। यह क्रम सृष्टि के आरम्भ से चला आ रहा है और आने वाले समय में भी चलेगा।
उल्लेखनीय है कि महात्मा शुकदेव जी ने भगवान् श्री विष्णु के अवतारों में से एक अवतार श्री नर नारायण जी के बारे में वर्णन करते हुए कहते हैं कि, राजन सृष्टि के आरम्भ में ही भगवान् श्री विष्णु जी के स्वरूप भगवान श्री नर नारायण जी ने अवतार ग्रहण कर बद्रीनाथ नामक आश्रम में तपस्या करने के लिए चले गए, जो हिमालय के गोद में वह स्थान वसा है, आज भी भक्तों के बीच उसी नाम से जाना जाता है। आश्चर्य की बात यह हो गई कि किसी ने जाकर देवराज इंद्र से कहा कि देवराज जी भगवान् नर नारायण जी बद्रीनाथ आश्रम में बहुत ही कठिन तपस्या कर रहे हैं, अगर यही स्थिति रही तो आने वाले निकट भविष्य में देवलोक पर भी कब्जा कर आपके राज सिंहासन पर आसिन्न हो सकते हैं। अब तो स्वाभाविक तौर से देवराज इंद्र को विशेष रूप से चिंता होने लगी, उन्होंने कामदेव एवं अन्य अप्सराओं को बुलाकर निर्देश दिया कि हिमालय के गोद में वसा बद्रीनाथ नामक स्थान में जाकर वहां पहले से ही तपस्या में तन्मय भगवान् श्री नर नारायण जी को किसी भी प्रकार से हस्तक्षेप कर उनकी तपस्या को भंग कर देना है।
गौरतलब है कि देवराज इंद्र का निदेश पाकर कामदेव जी ने अपने साथ अप्सराओं को लेकर भगवान् श्री नर नारायण जी के पास पहुंच गए। वहां जाकर देखा कि भगवान श्री नर नारायण जी पहले से ही तपस्या में तन्मय हैं। अब तो स्वाभाविक तौर से कामदेव जी ने अप्सराओं को अपनी मनमोहक भाव भंगिमा भगवान् श्री नर नारायण जी के सामने प्रस्तुत करने का निर्देश दिया तथा खुद भी भगवान के शरीर में प्रवेश करने का प्रयास अपनी योग माया शक्तियों के बल से करने लगे। परन्तु ज्योही कामदेव जी ने भगवान् श्री नर नारायण जी के शरीर में प्रवेश करना चाहा, उसी समय भगवान की तन्मयता भंग हो गई और भगवान ने सारी वस्तु स्थिति से अवगत होकर अपनी आंखों को खोलते हुए वहां पर कई अनुपम सुन्दरियों को प्रकट कर दिया जिसके सामने अप्सराएं बहुत फीकी मालूम पड़ रही थी। अब तो कामदेव जी काफी लज्जित महसूस करते हुए भगवान् श्री नर नारायण जी से माफी मांगते हुए कहते हैं कि प्रभु हमसे देवराज इंद्र के कहने पर बहुत बड़ी भूल हो गई है। प्रभु हम यह भी जान गए हैं कि आप पूर्ण काम हैं, आपको किसी भी प्रकार की कोई वस्तु की आवश्यकता नहीं है। अगर कोई भी वस्तु की आवश्यकता होगी तो आप स्वयं ही सक्षम हैं, उस आवश्यकता की पूर्ति करने के लिए। कामदेव जी के बातों को सुनकर भगवान् नर नारायण जी ने कहा कि कोई बात नहीं है किसी से भी भूल बस कोई भी गलती हो सकती है। मैं तुम्हें यह आदेश देता हूं कि यहां उपस्थित सुंदरियों में से कोई भी एक सुंदरी अपने साथ ले जाकर देवराज इंद्र को समर्पित कर सकते हो। अब तो स्वाभाविक तौर से कामदेव जी को यह बात समझने में देर नहीं लगी कि भगवान् श्री नर नारायण जी के तरफ से मीठे मीठे देवराज इंद्र को जवाब देना है। अतः कामदेव जी ने भगवान् श्री नर नारायण जी के आदेशों का पालन करते हुए देवराज इंद्र के दरबार में पहुँचकर सभी वस्तु स्थिति का वर्णन कर दिया।
आप सबों का,
दिवाकर,