राजा परीक्षित जी भागवत महापुराण की कथा सुनने के क्रम में महात्मा शुकदेव जी से प्रश्न करते हैं कि महात्मा जी हमें यह तो बताए कि भगवान् श्री कृष्ण जी जो महभागवत श्री सुदामा जी द्वारा सौगात में भगवान् श्री कृष्ण जी को चुरा और मुरही के दाना जो उपहार में देने के लिए ले गए थे, क्या भगवान् उसको ग्रहण किया था ? राजा परीक्षित जी की बातों को सुनकर महात्मा शुकदेव जी बहुत ही गंभीर वाणी में कहा कि राजन, तुमने बहुत ही सुन्दर प्रश्न किया है, मैं उसका जवाब दे रहा हूं, तुम एकाग्र चित होकर उसे ध्यान के साथ सुनो, महाभागवत श्री सुदामा जी के नए भाग्य का निर्धारण उस पांच मुठी चुरा और मुरही में ही समाहित था, परन्तु आश्चर्य की बात यह है कि महाभागवत श्री सुदामा जी। भगवान् श्री कृष्ण जी के ऐश्वर्य और विलासिता पूर्ण जीवन को देखकर वे नहीं चाहते थे कि अपने साथ लाए चुरा और मुरही रूपी सौगात भगवान् को ग्रहण करने के लिए पेश करें। उल्लेखनीय है कि महाभागवत श्री सुदामा जी अंदर से बहुत ही लज्जित महसूस कर रहे थे। परंतु भगवान कृष्ण जी तो सभी के अंदर के भाव को जानने वाले अंतर ज्ञानी थे, उनसे कोई भी व्यक्ति क्या छुपा सकता है ?
गौरतलब है कि भगवान् श्री कृष्ण जी, जब अपने परम मित्र श्री सुदामा जी को सादर सत्कार एवं स्वादिष्ट व्यंजन खिलाने के पश्चात् बहुत ही व्यंग्यात्मक अंदाज में अपने प्यारे सखा श्री सुदामा जी से कहते हैं कि लगता है कि मेरी भाभी आपको मुझे खाने के लिए कुछ देकर भेजा है? क्या मेरे प्यारे सखा मुझे अपने बगल में चिपकाए हुए अपनी गठरी मुझे थोड़ा दीजिए तो ! अब तो स्वाभाविक तौर से भागवत सुदामा जी केवल अपने मुख से लजाते हुए, इतना ही कहा कि नहीं मेरे मित्र खाने के योग्य इसमें कुछ नहीं है। तत्पश्चात भगवान श्री कृष्ण जी ने उनसे बलपूर्वक गठरी को ले लिया, उसके उपरांत गठरी को खोलकर उसमें से मात्र एक मुट्ठी दाना निकालकर खाया तथा भगवान् ने कहा इतना सुन्दर व्यंजन मैं जीवन में पहली बार खा रहा हूं, तभी तो मेरे प्यारे सखा आप लोभ वश रात में एकांत में खाने के लिए रखे थे, साथ ही भगवान कृष्ण जी ने यह भी कहा कि मैं जानता हूं कि जब खाने पीने की कोइ भी प्यारी वस्तु किसी को कोई नहीं देना चाहता है चाहे मेरे जैसे कोई परम मित्र हो या कोई भी परम प्रिय क्यों ना हो ? इसके पाश्चात्य। जब भगवान् श्री कृष्ण जी अपना दूसरा मुट्ठी दाना निकालने के लिए ,जैसे ही भगवान् ने प्रयास किया, त्योंहि लक्ष्मी स्वरूपा माता श्री रूक्मिणी जी ने भगवान् श्री कृष्ण जी को यह कहकर उनका हाथ पकड़ लिया कि स्वामी जब अपने परम मित्र के लाया हुआ सौगात केवल आप अकेले ही चखेंगे। बहुत ही भाग्य से ऐसा पदार्थ खाने को मिलता है ! अब थोड़ा हमलोगों के लिए भी खाने के लिए रहने दीजिए।
उल्लेखनीय है कि भगवान श्री कृष्ण जी जैसे ही महाभागवत सुदामा जी के लाए हुए दाना को ग्रहण किया, वैसे ही भगवान के उदर में विराजमान सभी योग माया शक्तियाँ अपने आप भगवान् श्री कृष्ण जी के भाव युक्त आदेश प्राप्त कर महाभागवत श्री सुदामा जी के निवास पर जाकर उनकी पत्नी सुशीला जी से आदेश प्राप्त करने का प्रयास करने लगी। उन योग माया शक्तियों ने सुशीला जी से कहा कि हमें भगवान् श्री कृष्ण जी से आदेश प्राप्त हुआ है कि आपको एक सुन्दर सभी प्रकार के भोग ऐश्वर्य से युक्त यथाशीघ्र एक महल तैयार कर दिया जाए।
उल्लेखनीय है कि जब भगवान् के योग माया शक्तियों के मुँह से इस प्रकार की बातों को सुना तो सुखद आश्चर्य चकित होते हुए उन्होंने बहुत ही सौम्य भाव से जवाब दिया कि यदि आप लोग भगवान् श्री कृष्ण जी के आदेश के अनुसार मुझे महल बनाकर देना चाहती हैं तो मुझे भगवान् का आदेश तब स्वीकार होगा जब आपलोग वैसा ही महल मेरे सभी पड़ोसियों को भी बनाकर दे देगे। अब तो स्वाभाविक तौर से उन योग माया शक्तियों को सुशीला जी का आदेश मानना ही था, क्योंकि भगवान् श्री कृष्ण जी अपने मनो भावों द्वारा उन योग माया शक्तियों को स्पष्ट आदेश दिया था कि सुशीला के सभी आदेश मेरा ही दिया हुआ आदेश समझना होगा।
गौरतलब है कि योग माया शक्तियों ने भगवान् श्री विश्वकर्मा जी को बुलाकर इस कार्य में सहयोग लिया। भगवान् श्री विश्वकर्मा जी भी अपने आप को धन्य समझने लगे कि भगवान श्री कृष्ण जी के दिए हुए आदेश के अनुसार मैं कोई महल बना रहा हूं। उल्लेखनीय है कि भगवान श्री विश्वकर्मा जी देखत देखते सभी महल तैयार कर दिया, जैसे धरती पर कोई इंद्र लोक वश गया हो।
उल्लेखनीय है कि अब महाभागवत श्री सुदामा जी भगवान् श्री कृष्ण जी से अपने घर जाने के लिए आज्ञा प्राप्त करने लगे। तत्पश्चात भगवान् श्री कृष्ण जी ने अधूरे मन से गले मिलते हुए अपने सखा श्री सुदामा जी को घर जाने के लिए अनुमति दे दी। गौरतलब है कि भगवान श्री कृष्ण जी अपने रथ द्वारा ही अपने मित्र सुदामा जी को उनके घर तक विदा करना चाहते थे, परन्तु सुदामा जी ने बलपूर्वक जोर देकर भगवान् को ऐसा करने से मना कर दिया।
हैरत की बात यह है कि महाभागवत श्री सुदामा जी मन में यह विचार करने लगे कि मुझे तो कोइ भी धन से किसी भी प्रकार कोई लगाव नहीं है, परन्तु मेरी पत्नी भगवान् के पास एक उम्मीद से यह सोचकर ही मुझे भेजी थी कि शायद मुझे भगवान् श्री कृष्ण जी के पास जाने से हमलोग की सभी प्रकार के दुख दरिद्रता मिट जाएगी। परन्तु भगवान श्री कृष्ण जी ने तो ऐसा कुछ भी नहीं किया ? तत्पश्चात फिर सहसा सुदामा जी के दिमाग में एक बात आती है कि भगवान श्री कृष्ण जी बहुत ही अंतर ज्ञानी हैं, वे जानते हैं कि इसको अगर धन दे दिया जाए तो यह स्वाभाविक तौर से बावरा हो जायेगा। जैसे बिल्ली को घी हजम नहीं होता है, उसी प्रकार इसे भी किसी भी प्रकार धन हजम नहीं होगा। तत्पश्चात अनेक प्रकार के बातों को सोचते हुए जब वे अपने निवास स्थान के पास जैसे ही पहुंचे तो उनको यह विश्वास ही नहीं हुआ कि यह मेरा निवास स्थान है। तब उनकी पत्नी सुशीला जी ने ऊपर अपने महल से झांकते हुए सुदामा जी से कहा कि स्वामी आश्चर्य चकित ना हों , यह सब आपके परम मित्र भगवान श्री कृष्ण जी के कृपा प्रसाद से संभव हुआ है। तत्पश्चात अपने दासियों के साथ सुशीला जी अपने पति परमेश्वर की सेवा सत्कार करने लगी।
आप सबों का,
दिवाकर,