राजा परीक्षित जी श्री भागवत महापुराण की कथा को सुनने के क्रम में महात्मा शुकदेव जी से प्रश्न करते हैं कि महात्मा जी, हमे यह बताने की कृपा करें कि सुधर्मा सभा क्या होता है? साथ ही राजा परीक्षित जी ने यह भी पूछा कि महात्मा जी हमें यह भी बताएं कि भगवान् श्री कृष्ण जी द्वारा अपने सुधर्मा सभा में अपने शुभचिंतको के साथ चर्चा कर रहें थे तो,उस समय देवर्षि नारद जी तथा मगध नरेश जरासंध द्वारा बन्दी बनाए गए राजाओं के दूत भगवान् श्री कृष्ण जी के पास किस उद्देश्य से आए थे ?
उल्लेखनीय है कि राजा परीक्षित जी के प्रश्नों को सुनकर महात्मा शुकदेव जी ने कहा कि राजन, अपने बहुत ही सुन्दर प्रश्न किया है ? अब में आपके सभी प्रश्नों का जवाब एक एक करके दे रहा हूं। अब तो स्वाभाविक रूप से महात्मा शुकदेव जी ने जवाब देते हुए कहा कि राजन, सुधर्मा सभा एक ऐसी सभा है जिसमें भाग लेने वाले व्यक्तियों को ना तो भूख लगती और ना ही प्यास लगती है,यही नहीं राजन इस सभा में प्रवेश करने के पाश्चात्य इसमें प्रवेश करने वाले व्यक्तियों को जरा, व्याधि एवं मृत्यु का भी भय नहीं रहता है। तत्पश्चात महात्मा शुकदेव जी ने कहा कि जहाँ तक उसी समय देवर्षि नारद जी एवं जरासंध के द्वारा बंद किए गए राजाओं के दूत के आने के सम्बन्ध में बात है तो मैं इसके सम्बन्ध में बतला रहा हूं। राजन कौरवों के साथ युद्ध में विजयी होने के उपरांत हस्तिनापुर की गद्दी पर राजा युधिष्ठिर राज कर रहे थे,अब राजा परीक्षित का एकमात्र उद्देश्य था कि पृथ्वी पर एकाधिक्य राज करने के उद्देश्य से राजसूय यज्ञ करवाना चाहते थे।ऐसे में यह स्वाभाविक ही था कि इसके लिए भगवान कृष्ण जी का आशीर्वाद भली भांति प्राप्त हो। इसी उद्देश्य की पूर्ति हेतू देवर्षि नारद जी के माध्यम से भगवान् कृष्ण जी को हस्तिनापुर आमंत्रित करना चाहते थे। उल्लेखनीय है कि जिस समय देवर्षि नारद जी वहां पहुंचे,उसी समय मगध नरेश जरासंध के द्वारा कैद किए गए लगभग बीस हजार से अधिक राजाओं के दूत भी भगवान् श्री कृष्ण जी से सहायता मांगने के लिए पहुंच गया। यद्यपि भगवान् श्री कृष्ण जी के लिए दोनों को सहायता देना बड़ी बात नहीं थी, परन्तु सबसे पहले किसको सहायता किया जाय। गौरतलब है कि भगवान मन ही मन में यह सोचने लगे कि क्या यह उचित होगा कि राजा युधिष्ठिर द्वारा धर्मपूर्वक किए जा रहे राजसूय यज्ञ में सम्मिलित हुआ जाय या बहुत दिनों से जरासंघ द्वारा अपने कैद के माध्यम से प्रताड़ित किए जा रहे राजाओं को मुक्त किया जाय। हालांकि इस विषय पर निर्णय करना भगवान के लिए कोई बहुत बड़ी बात नहीं थी, परंतु अपने सखा उद्धव जी को मान देते हुए भगवान श्री कृष्ण जी ने उनसे इस दुविधा युक्त स्थिति से निकलने के लिए उचित सलाह देने का आग्रह किया। अब तो स्वाभाविक तौर से उद्धव जी भगवान् श्री कृष्ण जी के मांगे गए सलाह से अपने को गौरवान्वित महसूस करते हुए कहा कि, प्रभु आपके लिए कोई भी कार्य करना असंभव नहीं है। अगर कोई भी व्यक्ति यदि कोई कार्य करता है तो,वह केवल उस किय गए कार्य का निमित मात्र है। सब कार्य तो प्रभु आपके कृपा से ही होता है।साथ ही उद्धव जी ने कहा कि प्रभु राजसूय यज्ञ करने का एकमात्र उद्देश्य राजा युधिष्ठिर का है कि पृथ्वी पर एकछत्र राज स्थापित करना ! अतः यह स्वाभाविक ही है कि प्रभु राजा युधिष्ठिर के राजसूय यज्ञ के सफलता में बहुत बड़ा बाधक बन सकता है, मगध के राजा जरासंध ? उद्धव जी ने आगे यहाँ तक कहा कि जहाँ तक मेरी समझ की बात है तो,प्रभु आप अपने हाथों से जरासंघ का वध नहीं करना चाहते हैं, क्योंकि जरासंध ब्राह्मणों के भक्त होने के कारण आप उसे युद्ध में लगातार 17 बार हराने के बाद भी उसे छोड़ दिया। यही नहीं प्रभु आपने तो जरसंघ का मान रखने के लिये, आप मथुरा छोड़कर द्वारिका नगरी में बसना पसंद किया। फिर उद्भव जी ने कहा कि प्रभु हमारे समझ से आपको पहले हस्तिनापुर जाकर राजा युधिष्ठिर को राजसूय यज्ञ की शुरुआत करने का आशीर्वाद देना चाहिए , तत्पश्चात राजा युधिष्ठिर जी के भाई भीमसेन जी को राजा जरसंघ से युद्ध लड़ने के लिए प्रेरित करना चाहिए।
उल्लेखनीय है कि भगवान श्री कृष्ण जी को अपने सखा उद्धव जी के दिए गए सलाह बहुत उचित प्रतीत हुआ। तत्पश्चात बंदी बनाए हुए राजाओं के दूत को आश्वासन देते हुए भगवान् श्री कृष्ण जी ने कहा कि शीघ्र ही बंदी हुए राजाओं को जरासंध के कैद से मुक्त करा दिया जायेगा। तत्पश्चात भगवान् श्री कृष्ण जी अपने सभी सखा साथियों एवं पत्नियों के साथ हस्तिनापुर के लिये प्रस्थान कर गए। शाम ढलने से पहले ही भगवान् कृष्ण जी हस्तिनापुर की राजधानी इंद्रप्रस्थ पहुंचकर नगर से कुछ दूरी पर एक उपवन में टेंट लगाकर अपने सभी सहयोगियों के साथ विश्राम करने लगे। जैसे ही राजा युधिष्ठिर जी को मालूम हुआ कि भगवान् श्री कृष्ण जी नगर में आकर विश्राम कर रहें हैं, वैसे ही राजा युधिष्ठिर जी ने अपने भाइयों एवं वरिष्ठ मंत्रियों के साथ भगवान् श्री कृष्ण जी के पास जाकर उनको काफी वैदिक रिति से पूजा अर्चना करके स्वागत सत्कार किया।
शेष अगले पोस्ट में,
आप सबों का,
दिवाकर,