महात्मा श्री शुकदेव जी, भागवत महापुराण की कथा को सुनाते हुए राजा परीक्षित जी से कहते हैं कि, राजन जो मनुष्य अपने आप जितना संतुष्ट होता है, वह उतना ही सुखी एवं शांति पूर्ण जीवन व्यतीत करता है, उन्होंने भागवत भक्त श्री सुदामा जी का उदाहरण देते हुए कहा कि राजन सुदामा जी को जितना भी आकाशीय वृति से जो कुछ सामग्री प्राप्त हो जाता था उसी से वह अपना खुशी खुशी जिवन व्यतीत कर लेते थे, परंतु एक दिन उनकी पत्नी को यह देखकर काफी कष्ट हुआ कि उनके बच्चे भूख से बिलख रहे हैं,तब उन्होंने अपने पति श्री सुदामा जी से कहा कि स्वामी जिनके मित्र त्रिलोकी के मालिक है,वह दरिद्रता में जीवन व्यतीत करे यह मुझे समझ में नहीं आता है, फिर सकुचाते हुए सुदामा जी की पत्नी ने कहा कि स्वामी मैं यह नहीं कह रहा हूं कि आप उनसे जाकर कुछ माँग कर यहां ले आईये, परन्तु वह मित्रता कैसी जो अपने मित्र का समाचार समय समय पर नहीं पूछे।
उल्लेखनीय है कि अपनी पत्नी की बातों पर सुदामा जी यह मन में बिचार किया कि बहुत दिनों से अपने मित्र से भेट नहीं किया है, अगर अपने मित्र के पास जाता हूँ तो स्वाभाविक तौर से मेरे साथ मेरे मित्र भगवान श्री कृष्ण जी भी आनंदित होंगे। दूसरी तरफ सुदामा जी के मन में यह भी प्रश्न उठता है कि शास्त्रों के अनुसार अपने गुरु, अपने रिश्तेदार या अपने मित्र के घर कुछ ना कुछ सौगात लेकर जरूर जाना चाहिए , इस मन में उठ रहे सवाल पर अपनी पत्नी सुशीला जी से विचार विमर्श किया। तत्पश्चात उनकी पत्नी सुशीला जी चुरा मुरही का पांच मुठी दाना अपने पड़ोसी के घर से मांग कर ले आई और उनको फटे पुराने कपड़े में गांठ बांधकर दे दिया ।
गौरतलब है कि अपनी पत्नी के कहने के अनुसार श्री सुदामा जी अपने मित्र भगवान श्री कृष्ण जी से मिलने के लिए उनके नगर द्वारिका पूरी के लिए चल दिए।अब पूरा रास्ता यही सोच रहे थे कि पता नहीं बहुत दिन मुलाकात किए हुए बीत गए हैं, अब से काफी बड़े आदमी हो गए हैं, मुझसे मिलेंगे की नहीं ? अगर किसी भी प्रकार मिल भी गए तो वे भगवान हमको पहचानेंगे की नहीं ? यह सब काफी सवाल मन में उठते हुए, कई दिनों की पैदल यात्रा करने के पाश्चात्य भगवत श्री सुदामा जी द्वारिका पूरी पहुंच गए।
उल्लेखनीय है कि जब श्री सुदामा जी द्वारिका पूरी में महल के गेट पर पहुंचते हैं तो स्वाभाविक तौर से उनको वहां के द्वारपाल द्वारा सुदामा जी को रोक दिया जाता है। जब श्री सुदामा जी द्वारा अपने आप को भगवान् श्री कृष्ण जी के मित्र के रूप में परिचय दिया जाता है तो वहां के द्वारपाल को उनके वेश भूषा देखकर काफी आश्चर्य चकित होता है।तभी वहाँ एक अन्य समझदार द्वारपाल समझ जाता है कि मित्रता में अमीरी और गरीबी का कोई फर्क नहीं होता है। तत्पश्चात द्वारपाल ने भगवान श्री कृष्ण जी को जाकर उनके आने के सम्बन्ध में सूचित करता है ।उल्लेखनीय है कि जिस प्रकार के वेश भूषा के सम्बन्ध में भगवान् को द्वारपाल बताता है, उससे भगवान श्री कृष्ण जी यह सहसा समझ गए कि वे अवश्य हमारे परम मित्र श्री सुदामा जी ही होंगे।
गौरतलब है कि भगवान श्री कृष्ण जी के आदेशानुसार द्वारपाल ने आदर सत्कार के साथ श्री भागवत सुदामा जी को भगवान् श्री कृष्ण जी के महल में ले गया, जहां भगवान् श्री कृष्ण जी अपनी पत्नी रुक्मिणी जी के साथ हास्य विनोद कर रहे थे। जब भगवान् श्री कृष्ण जी का नजर अपने मित्र सुदामा जी पर पड़ी तो स्वाभाविक रूप से भगवान् कृष्ण जी ने खड़े होकर उनको गले से लगाया, तत्पश्चात् भगवान् श्री कृष्ण ने अपने हाथों से सुदामा जी को पावं पखारा, तत्पश्चात भगवान श्री कृष्ण जी ने उनको अपनी पत्नी रुक्मिणी जी के साथ काफी स्वादिष्ट व्यंजन खिलाया। तत्पश्चात भगवान श्री कृष्ण जी ने सुदामा जी को अपने हाथ से उनके पैरों को दबाया और सभी प्रकार के गृहस्थी के सम्बन्ध में हाल चाल पूछा।
शेष अगले पोस्ट में,
आप सबों का
दिवाकर ,