महात्मा श्री शुकदेव जी, राजा परीक्षित जी को भागवत महापुराण की कथा सुनाने के क्रम में कहते हैं कि राजन जब बाणासुर से भगवान् कृष्ण जी एवं भगवान बलराम जी युद्ध जीत कर द्वारिका वापस आए तो, उन्होंने कुछ दिनों आराम करने के पाश्चात्य भगवान् श्री कृष्ण जी से ब्रज जाने के सम्बन्ध में विचार विमर्श किया। तत्पश्चात भगवान श्री कृष्ण जी ने कहा कि भैया इससे सुंदर बात क्या होगी कि वहाँ जाकर आप हमलोगों की माताएँ यशोदा माता, रोहिणी माता एवं पालनहार पिता नन्द बाबा सहित वहां की गोपियों एवं सखा ग्वाल बालों का समाचार आपके माध्यम से हमलोगों को प्राप्त हो जायेगा। साथ ही भगवान कृष्ण जी ने कहा कि भैया ब्रज में आपको जाने से माता पिता सहित सभी ब्रजवासियों की उदासी भी मेरे सहित द्वारिका वासियों का समाचार जानकर दूर हो जायेगा।
गौरतलब है कि अब भगवान बलराम जी अपने श्रेष्ट रथ जिसमें अश्व हवा के समान तेज चाल चलने वाला जूता गया था,उस रथ में अपने प्रिय अनुचरों के साथ ब्रज जाने के लिय द्वारिका नगरी से प्रस्थान कर गए। शाम होते होते नन्द बाबा के घर के सामने जब रथ रुका तो उनको देखकर उनके पहचान वाले सखा ग्वाल बालों द्वारा पूरे ब्रज में बलराम जी के आने की बात जंगल में आग की तरह फैला दिया। तत्पश्चात धीरे धीरे सभी ब्रजवासी भगवान बलराम जी से मुलाकात करने के लिए आते, बलराम जी भी अपने से बड़ों को पैर छूकर आशीर्वाद प्राप्त करते तथा बराबरी वालों से हाथ मिलाकर अपना प्रेम प्रकट करते।यही नहीं बलराम जी से छोटे ब्रजवासी उनको पैर छूकर आशीर्वाद प्राप्त करते।
उल्लेखनीय है कि समय बीतने के साथ गोपियां भी बलराम जी के पास आकर कटाक्ष भरी बाते करती हुई कहती कि बलदेव भैया आप तो हमलोगों को याद करके ब्रज में आने का कष्ट भी किया ! क्या हमारा श्याम सुंदर भी कभी हमलोगों को याद करता है,फिर दूसरी गोपी कहती कि ये रे सखी तुम भी क्या बात करती हो ? अगर हमारा श्याम सुंदर इतना ही हमलोगों को याद करता तो,क्या हमलोगों से वह बलदेव भैया के साथ आकर हमलोगों से मुलाकात नहीं करता ! फिर अन्य सखी बोलती कि शहर की नारियों के सामने हम जैसे ग्वार गोपियों को श्याम सुंदर क्या याद रखेगा?इन सभी गोपियों की बातों को सुनने के पाश्चात्य भगवान बलराम जी ने गोपियों के सामने भगवान श्री कृष्ण जी द्वारा भेजा गया संदेश कह सुनाया, जिसमे भगवान श्री कृष्ण जी गोपियों को प्रत्येक पल याद करते हुए,उनको अपने दिल में स्थान दे रखा है।अब तो स्वाभाविक रूप से गोपियां शांत होकर भगवान बलराम जी के साथ हास परिहास करने लगी,बलराम जी को भी इन गोपियों के संग बहुत अच्छा लगने लगा।
उल्लेखनीय है कि एक दिन भगवान् बलराम जी गोपियों के संग यमुना नदी में जल विहार करने का योजना बनाया तथा यह निश्चित किया गया कि आज रात को यमुना नदी में जल विहार किया जाएगा। उल्लेखनीय है कि योजना के अनुसार भगवान बलराम जी गोपियों के संग यमुना नदी के पास में जाकर यमुना नदी को आदेश दिया कि हे यमुना तुम अपनी धारा को और नजदीक हमलोगों के पास नजदीक आकर प्रवाहित करो।
गौरतलब है कि माता यमुना जी भगवान बलराम जी की बातों को अनसुनी करते हुए सोचे कि बलराम जी तो मदमस्त होकर मुझे अपनी धारा को परिवर्तित करने का आदेश दे रहें हैं। अगर इसी तरह सभी कोई मुझे अपने हिसाब से बराबर धारा बदलने का आदेश देता रहेगा तो मेरी क्या इज्जत रह जायेगी ? अब कुछ समय इंतजार करने के पश्चात भगवान बलराम जी ने देखा कि मेरे आदेश का अनुपालन यमुना नदी द्वारा नहीं किया जा रहा है तो उन्होंने अपना हल मूसल उठाकर यमुना नदी को कई टुकड़ों में विभक्त करने का निर्णय क्रोध पूर्वक लिया।
उल्लेखनीय है कि भगवान बलराम जी के क्रोध पूर्वक यमुना नदी के सम्बन्ध में लिए गए निर्णय के पाश्चात्य यमुना नदी द्वारा भगवान् बलराम जी के पास मूर्तिमान होकर पूजा अर्चना के सामग्री के साथ प्रकट हुईं तथा माता यमुना जी द्वारा भगवान् बलराम जी की स्तुति करते हुए कहा कि प्रभु मैं जानती हूं कि समस्त पृथ्वी का भार आपके ही अंश भगवान शंकर्षण जी पर टिका हुआ है। प्रभु आपके थोड़ी सी भृकुटी को टेढ़ी करने मात्र से समस्त भूमंडल में हाहाकार मच सकता है। प्रभु यही नहीं यह सभी नियम भी सभी तत्वों को अपनी मर्यादा में रहने के लिए आप ही लोगों द्वारा बनाया गया है। प्रभु अगर थोड़ी सी अनजाने में की गयी गलती के कारण आप ही अपने बनायी हुईं नियत का पालन नहीं करेंगे तो आम लोग कैसे करेंगे ? अब माता यमुना जी की बातों को सुनकर भगवान बलराम जी शांत हो गए तथा माता यमुना जी को अभय प्रदान कर दिया।
आप सबों का,
दिवाकर ,