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।। भगवान श्री कृष्ण जी द्वारा अपनी पत्नी रुक्मिणी जी के साथ हास परिहास । ।।

महात्मा शुकदेव जी, राजा परीक्षित जी से भागवत महापुराण की कथा सुनाते हुए कहते हैं कि, राजन माता श्री लक्ष्मी जी की अवतार स्वरूपा रुक्मिणी जी को यह भ्रम हो गया था कि भगवान् श्री कृष्ण जी मुझे ही सबसे अधिक प्रेम करते हैं,अब तो भगवान श्री कृष्ण जी के लिए स्वाभाविक ही था कि वह अपने भक्तों या प्रिय संबंधियों को हित करने के उद्देश्य से उनको भ्रम को तोड़ने के लिय जो कुछ भी आवश्यक होता है,वह भगवान सभी कुछ करते हैं।

उल्लेखनीय है कि इसी कड़ी में एक दिन भगवान् श्री कृष्ण जी अपनी पत्नी रुक्मिणी जी के कक्ष में बैठे हुए थे, तो उन्होंने रुक्मिणी जी को संबोधित करते हुए कहा कि देवी तुमने मुझसे शादी करके बहुत बड़ी गलती कर दी है,मै तुम्हारे योग्य नहीं हूं। कहां तुमसे शादी करने के लिय बड़े बड़े राजा ,महाराजा,आए हुए थे, जिसमे चेदीराज शिशुपाल,मगध नरेश जरासंध, दंत्रवक्र और ना जाने कितने अनजान राजाओं द्वारा तुमसे शादी करने की परिकल्पना मन में संजोए हुए थे। आखिर देवी दरबारियों द्वारा मेरी झूठ मूठ के तारीफ सुनकर तुमने ऐसा मुझमें क्या देख लिया कि तुम मुझसे शादी करने के लिय लालायित हो गई ? फिर भगवान श्री कृष्ण जी दुबारा रुक्मिणी जी की ओर मुखातिब होकर कहते हैं कि देवी मेरे पास ना तो राजकीय वंश का कोई पहचान है और ना ही कोई मेरा परंपरागत राज्य ही है। मैं तो देवी अपना परंपरागत मथुरा नगरी को छोड़कर राजा जरासंध के भय से द्वारिका पूरी बसा कर छुपा हुआ हूं।

गौरतलब है कि भगवान श्री कृष्ण जी की बातों को सुनकर रूक्मिणी जी का रो रोकर बुरा हाल हो चुका था।यही नहीं भगवान् श्री कृष्ण जी ने रुक्मिणी जी से यहां तक कह दिया था कि देवी अगर तुम चाहो तो अभी भी किसी के साथ विवाह कर सकती हो।अब तो भगवान की बातों को सुनकर रूक्मिणी जी के लिए बर्दास्त करना मुश्किल होने लगा। तत्पश्चात रूक्मिणी जी ने भगवान् श्री कृष्ण जी से रोते हुए कहा कि स्वामी आपका चाल,चरण, चरित्र का वर्णन सुनकर बड़े बड़े सिद्ध संतों द्वारा भी आपके दर्शन करने का मोह उत्पन्न हो जाता है,तो मैं एक साधारण नारी ठहरी! मुझे क्यों ना अभिलाषा होता आपसे प्रणय संबंध के बंधन में बंधने का,जहाँ तक आप यह कह रहे हैं कि मेरा कोई परंपरागत राजकीय वंश नहीं है,तो स्वामी बड़े बड़े राजा या महाराजा भी आपकी आज्ञा के अनुसार ही राजकीय वंश में जन्म लेते हैं।जो व्यक्ति पूरे अखिल कोटी ब्रह्माण्ड का नायक है, उसके लिए एक तुच्छ सा दिखावटी राजा रूपी पद प्राप्त करना कोई बहुत बड़ी बात नहीं है।यही नहीं रुक्मिणी जी ने भगवान् श्री कृष्ण जी से यह भी कहा कि स्वामी जो व्यक्ति मगध नरेश जरासंध को युद्ध में 17 बार हरा सकता है, उसे 18 वी बार हराना कोई मुश्किल कार्य नहीं था। परन्तु स्वामी हमने तो अभी तक यही सुना और जाना है कि आप अपने भक्तों या प्रिय संबंधियों के हित करने के उद्देश्य से खेल खेल में ही कोई भी लीला रच दिया करते हैं।स्वामी इसी लीला संबंधी कड़ी में आपके द्वारा द्वारिका नगरी को बसाना भी है।

उल्लेखनीय है कि भगवान श्री कृष्ण जी ने देखा कि रूक्मिणी जी की मेरी बातों को सुनकर काफी कष्ट पहुंचा है,तब भगवान ने रुक्मिणी जी की ओर मुखातिब होकर कहा कि देवी गृहस्थ धर्म में एक ही तो लाभ है कि अपनी उदासी या थकान मिटाने के लिए पति या पत्नी आपस में हास परिहास कर सकते हैं। मैं जानता हूं कि देवी तुम्हें मेरी बातों को सुनकर काफी तकलीफ हुई है, अरे तो केवल मजाक कर रहा था। क्योंकि देवी तुम जब गुस्से में होकर अपनी तिरछी नजरों से देखती हो ,तो मुझे बहुत ही अच्छा लगता है। अंततः भगवान् श्री कृष्ण जी ने रुक्मिणी जी से हास परिहास के लिए माफी मांग ली।

आप सबों का,

दिवाकर,

ND

Nandkumar Diwakar

Author & Founder, Radha Krishan Global Knowledge

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Nandkumar Diwakar is an avid researcher and writer dedicated to sharing authentic knowledge, insights, and perspectives through this blog platform.

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