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।। भगवान् श्री कृष्ण जी की इच्छा से यदुकुल वंश को समाप्त करने के लिए सिद्ध संतों एवं महात्माओं द्वारा श्राप दिलवा देना। ।।

महात्मा श्री शुकदेव जी, श्री भागवत महापुराण की कथा सुनाते हुए राजा परीक्षित जी से कहते हैं कि, राजन भगवान् श्री कृष्ण जी माता पृथ्वी की भार मुक्त करने के लिए इस धरती पर अवतरित हुए थे। उन्होंने अपने कार्य कलाप से असंख्य संख्या में अत्याचारी राजाओं एवं उनके अनुयायियों को युद्ध में मरवाकर पृथ्वी के भार को हल्का किया था, परन्तु इतने में ही भगवान् श्री कृष्ण जी संतुष्ट नहीं हुए थे। भगवान श्री कृष्ण जी के मन में दिल से इच्छा यही थी कि, जब तक पूरी तरह से यदुवंश समाप्त नहीं हो जाता है, तब तक उनका उद्देश्य पूरा नहीं हो सकता है।

उल्लेखनीय है कि द्वारिका पूरी में भगवान् श्री कृष्ण जी के छत्रछाया में रहने के कारण यदुवंशियों की स्थिति काफी समृद्धशाली थी। बताया जाता है कि यदुवंशियों की वैभव को देखकर देवता लोग भी प्रभावित होते थे। यही नहीं यदुवंशियों की स्थिति इतनी मजबूत थी कि आस पास के क्षेत्रों से वे लोग बिलकुल भय मुक्त थे। यहां तक कि देवताओं द्वारा भी यदुवंशियों को अनिष्ट करने की कल्पना नहीं की जाती थी।

गौरतलब है कि भगवान श्री कृष्ण जी इस धरा पर अपना कार्य काल का समय लगभग पूरा करने वाले ही थे, परंतु भगवान का मन एक ही जगह पर जाकर रुक जाता है कि जब तक यदुवंशियों को समाप्त नहीं किया जाता है, तब तक पृथ्वी पूरी तरह से भारमुक्त नहीं हो सकती है। अब तो स्वाभाविक तौर से यह प्रश्न चिन्ह खड़ा हो जाता है कि यदुवंशी इतने शक्तिशाली हैं कि मनुष्यों को कौन कहे देवताओं द्वारा भी इनको समाप्त नहीं किया जा सकता है। अतः भगवान् श्री कृष्ण जी से प्रेरणायुक्त होकर सभी ऊंचे स्तर के सिद्ध संतों एवं महात्माओं द्वारा द्वारिका पूरी के आस पास के क्षेत्रों में उस समय प्रवास किया जाने लगा, यहां तक कि देवर्षि नारद जी जो एक स्थान पर नहीं टिकते थे, वे भी द्वारिका क्षेत्र में प्रवास करने लगे।

गौरतलब है कि सिद्ध संतों एवं महात्माओं के प्रवास करने का समाचार पूरे द्वारिका पूरी में जंगल की आग की तरह फैल गई। उल्लेखनीय है कि द्वारिका के बच्चों में जिसमें जांबवती नंदन सांब भी था, उन सभी बच्चों को उन सिद्ध संतों एवं महात्माओं से मजाक करने की बात दिमाग में आयी। इसी संकल्प को पूरा करने के उद्देश्य से उन बच्चों ने जांबवती नंदन सांब को उसके पेट में कपड़ा बांधकर ऊपर से ढककर उन सिद्ध संतों एवं महात्माओं के पास जाकर बच्चों ने कहा कि देखिए महात्मा जी इसके पेट में बच्चा है, जिसका समय अब जन्म लेने के लिए पूरा होने वाला है, आप इसे अपना आशीर्वाद दे दीजिए।

गौरतलब है कि जब उन संतों ने अपने ध्यान द्वारा देखा तो यह स्पष्ट पता चला कि इन बच्चों द्वारा तो हम सभी सिद्ध संतों एवं महात्माओं को मजाक उड़ाया जा रहा है। अतः गुस्सा होकर उन संतों ने कहा जाओ इसके पेट में जो बच्चा है वह मूसल समान बलिष्ट होगा और इसी मूसल से तुम्हारा कुल यदुवंशियों का नाश हो जायेगा। यह स्वाभाविक ही था कि संतों एवं महात्माओं का श्राप या आशीर्वाद कभी निष्फल नहीं होता है।

उल्लेखनीय है कि उन सभी बच्चों द्वारा अपने साथ घटित घटनाओं को जाकर राजा उग्रसेन जी ने सुनाया। तत्पश्चात राजा उग्रसेन जी ने स्थिति को भांपकर सांब को पेट चीरा तो उसमें से एक लोहे का मूसल निकला, जिसको राजा ने चूर चूर करवाकर समुद्र में फिकवा दिया, जिसे एक मछ्ली ने उसके बहुत से हिस्से को खा लिया। तत्पश्चात एक मल्लाह ने पकड़कर उसे समुद्र के किनारे लाकर उस मछ्ली का पेट चीरा तो उसमें से जो मूसल का बुरादा गिरा, वही शक्ति शाली घास केरका उत्पन्न हुआ,जो यदुवंशियों को समाप्त करने में काफी मददगार साबित हुआ।

आप सबों का,

दिवाकर,

ND

Nandkumar Diwakar

Author & Founder, Radha Krishan Global Knowledge

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Nandkumar Diwakar is an avid researcher and writer dedicated to sharing authentic knowledge, insights, and perspectives through this blog platform.

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