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।। भगवान् श्री कृष्ण जी की कृपा से मगध नरेश जरासंध का भीमसेन द्वारा वध करना ।।

श्री भागवत महापुराण की कथा सुनाते हुए महात्मा शुकदेव जी, राजा परीक्षित जी से कहते हैं कि, राजन मगध नरेश जरासंध का अत्याचार आस पास के अन्य छोटे छोटे राज्यों के प्रति हर समय बढ़ रहा था,हद तो तब हो गया,जब उन राजाओं को जरासंध द्वारा बन्दी बना लिया गया।अब तो स्वाभाविक तौर से भगवान् कृष्ण जी के अतिरिक्त उन्हें कोई भी जरासंध के विरुद्ध उन बंदी राजाओं को सहायता प्रदान करने के लिए। दिखाई नहीं दे रहा था।

गौरतलब है कि लगभग बीस हजार से अधिक राजाओं को जरासंध द्वारा बन्दी बना लिया गया था।इन राजाओं ने अपने दूत को द्वारिका नगरी भेजकर भगवान श्री कृष्ण जी से जरासंध के कैद से आजाद करने हेतू सहायता करने का आग्रह किया, तत्पश्चात हमेशा अपने शरणागति की रक्षा करने वाले भगवान् श्री कृष्ण जी ने उस दूत को आश्वासन देकर विदा किया कि शीघ्र ही सभी बंदी बनाये गए राजाओं को जरासंध के कैद से शीघ्र आजाद किया जाएगा।

अंततः हस्तिनापुर पहुंचने के बाद भगवान श्री कृष्ण जी ने विचार किया कि जरासंध की ब्राह्मणों के प्रति भक्ति हमेशा प्रगाढ़ बनी रहती है,वह ब्राह्मणों द्वारा की गई कोई भी याचना अस्वीकार नहीं करता है। फलस्वरूप भगवान श्री कृष्ण जी द्वारा इस निष्कर्ष पर पहुंचा गया कि भीमसेन को जरासंध के विरुद्ध युद्ध के लिए प्रेरित किया जाए,क्योंकि दाेनों बल ताकत में समान भाव रखते हैं। तत्पश्चात भगवान श्री कृष्ण जी,अर्जुन और भीमसेन के साथ मगध नरेश जरासंध के राजधानी गिरी राज उसके दरबार में ब्राह्मण वेश में याचना करने के लिये पहुंचे। तत्पश्चात राजा जरासंध ने उन ब्राह्मणों को देखकर पूछा कि बोलो तुमलोगों की क्या समस्या है ? तुमलोग यहां किस उद्देश्य से आए हो ? उल्लेखनीय है कि भगवान श्री कृष्ण जी एवं अर्जुन, भीमसेन के शारीरिक हावभाव एवं बनावट को देखकर जरासंध शीघ्र ही समझ गया कि ये लोग ब्राह्मण वेश में क्षत्रिय हैं। तदोपरान्त जरासंध द्वारा उन याचक ब्राह्मण वेश धारी के वास्तविक स्वरूप को जानने के बाद भी जरासंध मन ही मन खुश हुआ कि मेरा इतना आम लोगों में खौफ है कि याचना करने के लिए भी ब्राह्मण का वेश धारण करना पड़ा सब कुछ जानने के उपरांत जरासंध ने उन ब्राह्मणों से कहा कि मैं अच्छी तरह जानता हूं कि तुमलोग ब्राह्मण नहीं हो,फिर भी तुमलोग अपनी मांग रखो , अवश्य पूरा करूंगा। जरासंध द्वारा इतना आश्वासन के पाश्चात्य भगवान् कृष्ण एवं अर्जुन, भीमसेन द्वारा अपने वास्तविक स्वरूप में आकर जरासंध से युद्ध करने के लिए आमंत्रित किया। अब तो स्वाभाविक तौर से जरासंध द्वारा व्यंग्यात्मक अंदाज में कहा गया कि मैं तुम लोगों से क्या युद्ध करूंगा ? युद्ध तो बराबरी वालों से किया जाता है, यह जो अर्जुन है, कहीं से भी मेरे बराबरी नहीं कर सकता है, जहां तक कृष्ण तुम्हारा बात है तो यह बात जगजाहिर है कि तुम मेरे डर से अपना परंपरागत मथुरा नगरी को छोड़कर द्वारिका नगरी में समुद्र के अंदर अपना नगर बसाया । साथ ही उसने यह भी कहा कि हां एक बीर है जो हमारी बराबरी का है। वह भीमसेन है, इसके साथ मैं युद्ध कर सकता हूं।

गौरतलब है कि जरासंध के इस घोषणा के उपरान्त अगले दिन जरासंध और भीमसेन युद्ध भूमि में लड़ने के लिए तैयार हो गए, लगभग 27 दिनों तक युद्ध करने के बाद भी भीमसेन द्वारा जरासंध को हराया नहीं गया तो भगवान् श्री कृष्ण जी ने उसके एक अंदरुनी बात को इशारो में भीमसेन को कहा कि जरासंध का शरीर को पहले दो हिस्से में विभाजन के उपरान्त जोड़ा गया है, अतः तुम उसके एक पैर को अपने लात से तथा उसके दूसरे पैर को अपने हाथ से पकड़कर चिर दो। अब तो स्वाभाविक तौर से भगवान् कृष्ण जी के इशारों को समझकर भीमसेन ने जरासंध को पकड़कर दो हिस्सों में चीर दिया। इसके पाश्चात्य स्वाभाविक रूप से भगवान् कृष्ण जी ने जरासंध के पुत्र सहदेव को मगध का राजा नियुक्त कर दिया। तथा सभी बंदी राजाओं को जरासंध के कारागार से मुक्त कर दिया।

आप सबों का,

दिवाकर,

ND

Nandkumar Diwakar

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Nandkumar Diwakar is an avid researcher and writer dedicated to sharing authentic knowledge, insights, and perspectives through this blog platform.

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